अमेरिकी बैंकिंग रेगुलेटर्स ने Coinbase और Robinhood जैसे क्रिप्टो एक्सचेंजों को अपने यूजर्स को स्टेबलकॉइन रिजर्व से 'इंटरेस्ट' जैसा रिवॉर्ड देने की अनुमति दे दी है। यह फैसला ट्रेडिशनल बैंकों के लिए कड़ी चुनौती बन सकता है, क्योंकि क्रिप्टो प्लेटफॉर्म्स पर मिलने वाला रिटर्न ट्रेडिशनल सेविंग अकाउंट्स से काफी ज्यादा है। हालांकि, निवेशकों को याद रखना चाहिए कि इसमें सरकारी इंश्योरेंस नहीं मिलता है।
अमेरिकी ऑफिस ऑफ द कंप्ट्रोलर ऑफ द करेंसी (OCC) ने क्रिप्टो एक्सचेंजों को स्टेबलकॉइन होल्डिंग्स पर ब्याज जैसा रिवॉर्ड देने का रास्ता साफ कर दिया है। इस बुधवार को आए इस फैसले के बाद Coinbase और Robinhood जैसे प्लेटफॉर्म अब अपने ग्राहकों को सरकारी ट्रेजरी एसेट्स और कैश डिपॉजिट से होने वाली कमाई का हिस्सा बांट सकेंगे। हालांकि, स्टेबलकॉइन जारी करने वाली कंपनियां खुद सीधे ब्याज नहीं दे सकेंगी, लेकिन यह फैसला उन एक्सचेंजों के लिए स्पष्टता लाता है जो इन डिजिटल एसेट्स को होस्ट करते हैं।
बैंकों के सामने बढ़ी मुसीबत
यह फैसला अमेरिकन बैंकर्स एसोसिएशन (ABA) की भारी लॉबिंग के बाद आया है, जिन्होंने चिंता जताई थी कि क्रिप्टो प्लेटफॉर्म्स और बैंकों के बीच का 'यिल्ड गैप' डिपॉजिट्स को अपनी ओर खींच सकता है। डेटा पर गौर करें तो क्रिप्टो प्लेटफॉर्म्स पर 3.5% तक का रिटर्न मिल रहा है, जबकि अमेरिका में FDIC-इन्श्योर्ड सेविंग अकाउंट्स पर औसतन मात्र 0.38% रिटर्न ही मिल पा रहा है। बैंकों का तर्क था कि इस अंतर से पारंपरिक बैंकिंग सिस्टम से पैसा बाहर निकल सकता है। अब OCC ने स्पष्ट कर दिया है कि वे इस पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाएंगे, बल्कि 'केस-बाय-केस' आधार पर अनुमति देंगे।
रिस्क फैक्टर को समझें
निवेशकों के लिए सबसे बड़ा जोखिम यह है कि इन रिवॉर्ड्स पर कोई सरकारी सुरक्षा नहीं है। ट्रेडिशनल बैंकों के डिपॉजिट के उलट, क्रिप्टो एक्सचेंजों में रखा पैसा फेडरल डिपॉजिट इंश्योरेंस कॉरपोरेशन (FDIC) द्वारा कवर नहीं किया जाता है। Better Markets जैसे उपभोक्ता अधिकार समूहों ने चेतावनी दी है कि निवेशक इन रिवॉर्ड्स को साधारण बैंक इंटरेस्ट समझकर गलती कर सकते हैं। इसमें दिवालिया होने (Insolvency) का खतरा अधिक है और आपका मूल पैसा किसी भी सरकारी सुरक्षा के दायरे में नहीं आता है।
ग्लोबल रेगुलेटरी रुख
यह फैसला GENIUS एक्ट के लागू होने की दिशा में एक बड़ा कदम है। भले ही यह फैसला सीधे तौर पर भारतीय बैंकिंग सिस्टम को प्रभावित न करे, लेकिन यह एक ग्लोबल केस स्टडी जरूर है। बाजार के जानकारों की नजर अब इस बात पर है कि अन्य देश स्टेबलकॉइन-लिंक्ड रिवॉर्ड्स को लेकर क्या रुख अपनाते हैं।
