Stablecoin B2B Payments: 2035 तक $5 ट्रिलियन के पार, बैंकों के लिए खड़ी हो सकती है बड़ी चुनौती!

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
Stablecoin B2B Payments: 2035 तक $5 ट्रिलियन के पार, बैंकों के लिए खड़ी हो सकती है बड़ी चुनौती!
Overview

क्रॉस-बॉर्डर B2B स्टेबलकॉइन पेमेंट्स का बाजार 2035 तक **$5 ट्रिलियन** तक पहुंचने का अनुमान है, जो मौजूदा स्तरों से **373 गुना** ज्यादा होगा। यह ग्रोथ स्टेबलकॉइन्स की तेज स्पीड, कम लागत और प्रोग्रामेबिलिटी के कारण पारंपरिक कॉरेस्पोंडेंट बैंकिंग सिस्टम के लिए एक बड़ी चुनौती पेश कर रही है।

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स्टेबलकॉइन्स अब अटकलों से हटकर बन रहे हैं पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर

स्टेबलकॉइन्स अब सिर्फ स्पेकुलेटिव ट्रेडिंग (speculative trading) का जरिया नहीं रह गए हैं, बल्कि ग्लोबल फाइनेंस का अहम हिस्सा बनने लगे हैं। खास तौर पर बिजनेस के लिए ये अंतरराष्ट्रीय पेमेंट्स (international payments) को आसान बना रहे हैं और सीधे तौर पर स्थापित कॉरेस्पोंडेंट बैंकिंग सिस्टम को चुनौती दे रहे हैं।

स्टेबलकॉइन पेमेंट्स पारंपरिक बैंकिंग को पीछे छोड़ सकते हैं

'जुनिपर रिसर्च' के अनुसार, 2035 तक क्रॉस-बॉर्डर बिजनेस-टू-बिजनेस (B2B) स्टेबलकॉइन पेमेंट्स का आंकड़ा चौंकाने वाले $5 ट्रिलियन तक पहुंच सकता है। यह 2026 में अनुमानित $13.4 बिलियन से एक बड़ी छलांग होगी। स्टेबलकॉइन्स, SWIFT जैसे पारंपरिक बैंकिंग सिस्टम के मुकाबले काफी बेहतर विकल्प दे रहे हैं, जहां अक्सर सेटलमेंट टाइम (settlement time) धीमा होता है, फॉरेन एक्सचेंज कॉस्ट (foreign exchange costs) ज्यादा लगती है और इंटरमीडियरी फीस (intermediary fees) भी देनी पड़ती है। वहीं, ब्लॉकचेन नेटवर्क (blockchain networks) पर स्टेबलकॉइन ट्रांजेक्शन (transaction) कुछ ही मिनटों में हो जाते हैं और इनकी लागत बहुत कम, यानी कुछ सेंट्स (cents) होती है। इसके साथ ही, ऑटोमेटेड ट्रेजरी ऑपरेशंस (automated treasury operations) और सप्लाई चेन सेटलमेंट्स (supply chain settlements) जैसी प्रोग्रामेबिलिटी फीचर्स (programmability features) इसे और भी आकर्षक बनाती हैं। Circle और Stripe जैसी कंपनियां पहले से ही क्रॉस-बॉर्डर ट्रांजेक्शन में मदद कर रही हैं, जिससे कंपनियों को फंड जल्दी मिल रहा है और वर्किंग कैपिटल (working capital) को मैनेज करना आसान हो रहा है।

B2B ट्रांजेक्शन से स्टेबलकॉइन्स को मिलेगी बड़ी रफ्तार

इस बंपर ग्रोथ की मुख्य वजह B2B एक्टिविटी है, जो 2035 तक कुल स्टेबलकॉइन ट्रांजेक्शन वैल्यू का 85% हिस्सा होगी। इसका मतलब है कि अब रिटेल ट्रेडिंग (retail trading) से हटकर एंटरप्राइज-लेवल यूटिलिटी (enterprise-level utility) की ओर शिफ्ट हो रहा है। 'चेनालिसिस' (Chainalysis) के एनालिसिस बताते हैं कि 2035 तक कुल स्टेबलकॉइन ट्रांजेक्शन वॉल्यूम $719 ट्रिलियन तक पहुंच सकता है। इस ग्रोथ के पीछे कुछ मुख्य कारण हैं: करीब $100 ट्रिलियन की जेनरेशनल वेल्थ ट्रांसफर (generational wealth transfer) जो क्रिप्टो-फ्रेंडली मिलनियल्स (Millennials) और Gen Z की ओर जा रही है। साथ ही, मर्चेंट पॉइंट्स-ऑफ-सेल (merchant points-of-sale) पर स्टेबलकॉइन पेमेंट्स का इंटीग्रेशन बढ़ना और Stripe और Mastercard जैसी बड़ी कंपनियों द्वारा मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास। जुनिपर रिसर्च के एनालिस्ट जवाद Jahan का कहना है कि स्टेबलकॉइन्स वहां ज्यादा तेजी से बढ़ रहे हैं जहां उनके फायदे साफ दिखते हैं, खासकर क्रॉस-बॉर्डर B2B डील्स (cross-border B2B deals) में।

कंपनियों के लिए जोखिम और चुनौतियां

हालांकि, बड़े पैमाने पर कंपनियों द्वारा इन्हें अपनाने में अभी भी कई चुनौतियां और जोखिम हैं। अपनी peg खोने के जोखिम के अलावा, कंपनियों को रिजर्व की क्वालिटी, रिडेम्पशन राइट्स (redemption rights), सैंक्शन्स कंप्लायंस (sanctions compliance) और सुरक्षित वॉलेट मैनेजमेंट (secure wallet management) जैसी दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा। अलग-अलग देशों के नियम-कानूनों को समझना AML (एंटी-मनी लॉन्ड्रिंग), KYC (नो योर कस्टमर) और टैक्स रूल्स को लेकर कंप्लायंस को और जटिल बना देता है। ब्लॉकचेन के अपरिवर्तनीय ट्रांजेक्शन रिकॉर्ड (unchangeable transaction record) को बिजनेस की डिस्प्यूट रेजोल्यूशन (dispute resolution), चार्जबैक (chargebacks) और रिवर्सल (reversals) की जरूरत से जोड़ना मुश्किल हो सकता है, जिससे फ्रॉड (fraud) का जोखिम बढ़ सकता है। चेनालिसिस के मुताबिक, 2025 में 84% अवैध वर्चुअल-एसेट ट्रांजेक्शन वॉल्यूम में स्टेबलकॉइन्स का हिस्सा था, इसलिए सख्त ड्यू डिलिजेंस (due diligence) और AML/सैंक्शन्स कंट्रोल (AML/sanctions controls) की जरूरत है। इसके अलावा, अगर बैंक डिपॉजिट से फंड स्टेबलकॉइन्स में ट्रांसफर होता है, तो यह लेंडिंग (lending) को कम कर सकता है। सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC) से प्रतिस्पर्धा भी एक उभरती हुई चुनौती है।

स्टेबलकॉइन इश्यूअर्स के लिए स्ट्रैटेजिक रास्ता

स्पष्ट है कि स्टेबलकॉइन्स ग्लोबल ट्रेड की इनएफिशिएंसीज (inefficiencies) को दूर करके, अटकलों से आगे बढ़कर, इंस्टीट्यूशनल पेमेंट सिस्टम (institutional payment systems) का एक मुख्य हिस्सा बनने जा रहे हैं। स्टेबलकॉइन इश्यूअर्स (issuers) और पेमेंट प्रोवाइडर्स (payment providers) के लिए सबसे महत्वपूर्ण है कि वे कंपनियों के साथ डीप इंटीग्रेशन (deep integrations) और मजबूत ट्रेजरी पार्टनरशिप (treasury partnerships) पर ध्यान केंद्रित करें। 2035 तक $5 ट्रिलियन का B2B मार्केट एक कंपीटिटिव नेसेसिटी (competitive necessity) है। सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे जटिल रेगुलेशन (regulations) को कैसे नेविगेट करते हैं, जोखिमों का प्रबंधन कैसे करते हैं, और ग्लोबल बिजनेस ऑपरेशंस (global business operations) में इंटीग्रेट होने के लिए आवश्यक विश्वास कैसे बनाते हैं।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.