पॉलिसी का विरोधाभास और कैपिटल का पलायन
राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा द्वारा वर्चुअल डिजिटल एसेट्स (VDAs) को भारत में लीगल करने की हालिया मांग ने एक पुरानी समस्या को और हवा दे दी है। दरअसल, भारत का क्रिप्टोकरेंसी और अन्य डिजिटल एसेट्स को लेकर रवैया एक बड़े विरोधाभास को जन्म दे रहा है। सरकार जहां इन पर भारी टैक्स लगा रही है, वहीं यह सेक्टर अभी भी एक रेगुलेटरी 'ग्रे जोन' में काम कर रहा है। इसी अनिश्चितता के चलते कैपिटल और इनोवेशन बेहतर Clarity की तलाश में देश के बाहर जा रहे हैं।
टैक्स है बड़ा, पहचान 'फीकी'
भारत की VDA पॉलिसी में एक बड़ा फंडामेंटल कांट्राडिक्शन है। क्रिप्टोकरेंसी और अन्य डिजिटल एसेट्स पर फायदे (Gains) पर 30% का फ्लैट इनकम टैक्स और ट्रांजैक्शन पर 1% का टैक्स डिडक्टेड एट सोर्स (TDS) लग रहा है। लेकिन, हकीकत यह है कि इस इंडस्ट्री को कोई फॉर्मल लीगल रिकग्निशन नहीं है, न ही कोई डेडिकेटेड लाइसेंसिंग फ्रेमवर्क या मजबूत इन्वेस्टर प्रोटेक्शन मैकेनिज्म है। इंडस्ट्री के लोग इसे "टैक्स्ड ऐज़ लीगल बट रेगुलेटेड ऐज़ इल्लीगल" (Taxed as legal but regulated as illegal) बता रहे हैं। इस दोहरी नीति के गंभीर आर्थिक परिणाम हो रहे हैं। अनुमान है कि अब तक 12 करोड़ भारतीय विदेशी प्लेटफॉर्म्स के जरिए इनवेस्ट कर रहे हैं, जिससे VDA ट्रांजैक्शंस का लगभग ₹4.8 लाख करोड़ ऑफशोर ट्रांसफर हो गया है। इसका एक और बड़ा सबूत यह है कि भारत का 73% ट्रेडिंग वॉल्यूम विदेशी एक्सचेंजों पर शिफ्ट हो गया है। साथ ही, लगभग 180 भारतीय क्रिप्टो स्टार्टअप्स ने दुबई और सिंगापुर जैसी जगहों पर जाकर अपनी पहचान बनाई है, जहां उन्हें रेगुलेटरी Clarity मिल रही है। ऐसे में, दूसरे देश डिजिटल एसेट एक्टिविटी को आकर्षित करने के लिए स्पष्ट रेगुलेटरी रवैया अपना रहे हैं, जबकि भारत पिछड़ रहा है।
ग्लोबल बेंचमार्क और चूके मौके
जबकि भारत अपनी VDA पॉलिसी से जूझ रहा है, दुनिया के कई देश अपने डिजिटल एसेट लैंडस्केप को आकार दे रहे हैं। सिंगापुर और दुबई जैसे देश स्पष्ट रेगुलेटरी फ्रेमवर्क और कॉम्पिटिटिव टैक्स एनवायरनमेंट के साथ इनोवेशन और इन्वेस्टमेंट के हब के रूप में खुद को स्थापित कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, सिंगापुर 17% का कॉर्पोरेट टैक्स रेट ऑफर करता है, वहीं दुबई में 0-9% कॉर्पोरेट टैक्स है। यह व्यवसायों को predictability और ग्रोथ के अवसर दे रहा है। इसके विपरीत, भारत का VDA मार्केट, जो 2025 तक $6.4 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है, उसका एक बड़ा हिस्सा रेवेन्यू और इनोवेशन के रूप में ऑफशोर जा रहा है। एनालिस्ट रिपोर्ट्स बताती हैं कि भारत में लॉस सेट-ऑफ की अनुमति न होना और हाई TDS का बोझ ट्रेडर्स को ऑफशोर ऑप्शंस की ओर धकेल रहा है। भारत का VDA मार्केट, बड़ी ग्राउंड-लेवल एडॉप्शन के बावजूद, इस उभरते हुए सेक्टर से मिलने वाले आर्थिक फायदे को खो रहा है।
एनालिटिकल डीप डाइव: कंप्लायंस बनाम कॉम्पिटिटिवनेस
हाल की पॉलिसी मूव्स, जैसे कि 8 जनवरी 2026 से प्रभावी Financial Intelligence Unit (FIU-IND) द्वारा अपडेटेड AML और CFT गाइडलाइन्स, कंप्लायंस को मजबूत करने और VDA सर्विस प्रोवाइडर्स को पारंपरिक फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस के मानकों के करीब लाने का लक्ष्य रखती हैं। इन गाइडलाइन्स में मजबूत 'नो योर कस्टमर' (KYC) प्रोसीजर, साइबर सिक्योरिटी ऑडिट और अन-होस्टेड वॉलेट ट्रांजैक्शंस की मॉनिटरिंग शामिल है, जिसका मकसद मनी लॉन्ड्रिंग और टेररिस्ट फाइनेंसिंग को रोकना है। इसके अलावा, यूनियन बजट 2026 में नई पेनल्टीज़ का प्रस्ताव है, जिसमें स्टेटमेंट फाइलिंग में देरी के लिए ₹200 प्रति दिन और गलत रिपोर्टिंग के लिए ₹50,000 का फाइन शामिल है, जो 1 अप्रैल 2026 से प्रभावी होगा। ये उपाय ज्यादा Oversight की ओर इशारा करते हैं, लेकिन ये टैक्स स्ट्रक्चर और एसेट क्लास की फॉर्मल पहचान न होने जैसे मुख्य मुद्दों को हल नहीं करते। इंडस्ट्री लीडर्स का तर्क है कि कंप्लायंस पर यह फोकस, टैक्स रिजीम को बदले बिना, कैपिटल फ्लाइट को नहीं रोकेगा।
⚠️ फॉरेnsic बेयर केस: सिस्टमैटिक रिस्क
भारत का VDA रेगुलेटरी अप्रोच बड़े सिस्टमैटिक रिस्क पैदा कर रहा है। हाई टैक्सेशन और रेगुलेटरी अस्पष्टता का विरोधाभास भारतीय कैपिटल और टैलेंट को देश से बाहर धकेल रहा है, जो घरेलू Oversight और संभावित टैक्स कलेक्शन की पहुंच से दूर हो रहे हैं। इससे सालाना हजारों करोड़ों की संभावित टैक्स रेवेन्यू का भारी नुकसान हो रहा है, साथ ही तेजी से विकसित हो रहे इस फाइनेंशियल फ्रंटियर पर रेगुलेटरी विजिबिलिटी और कंट्रोल भी कम हो रहा है। 73% ट्रेडिंग वॉल्यूम का ऑफशोर माइग्रेशन का मतलब है कि भारत न केवल टैक्स रेवेन्यू खो रहा है, बल्कि एक मजबूत डोमेस्टिक फिनटेक इकोसिस्टम और ब्लॉकचेन टेक्नोलॉजी में स्किल्ड वर्कफोर्स बनाने का अवसर भी गंवा रहा है। दुबई और सिंगापुर जैसे कॉम्पिटिटर देश स्टार्टअप्स के लिए ज्यादा आकर्षक माहौल दे रहे हैं, जिससे भारत में ब्रेन ड्रेन और इनोवेशन की कमी हो रही है। FIU-IND गाइडलाइन्स और नई पेनल्टीज़ जैसे उपायों के जरिए कंप्लायंस पर वर्तमान फोकस, जो एंटी-मनी लॉन्ड्रिंग प्रयासों के लिए आवश्यक है, मूलभूत आर्थिक हतोत्साह को दूर करने में विफल है। VDAs के लिए स्पष्ट लीगल स्टेटस और लॉस सेट-ऑफ की अनुमति देने वाले रैशनलाइज्ड टैक्स स्ट्रक्चर के बिना, यह सेक्टर इसी सब-ऑप्टिमल, ऑफशोर-डोमिनेटेड स्थिति में बना रहेगा, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक लूज-लूज परिदृश्य पैदा करेगा। इसके अलावा, भारत के अप्रैल 2027 तक OECD-led Crypto-Asset Reporting Framework (CARF) फॉर क्रॉस-बॉर्डर डेटा एक्सचेंज में शामिल होने की उम्मीद है, जिससे ऑफशोर एक्टिविटी और अधिक पारदर्शी हो जाएगी, और खोए हुए रेवेन्यू व रेगुलेटरी आर्बिट्रेज की सीमा को उजागर कर सकती है।
भविष्य का आउटलुक
जैसे-जैसे भारत अपनी VDA पॉलिसी के आर्थिक निहितार्थों से जूझ रहा है, आगे का रास्ता अनिश्चित बना हुआ है। जबकि बजट 2026 ने कंप्लायंस को मजबूत करने के लिए पेनल्टीज़ पेश की हैं, VDA के लिए मुख्य टैक्स स्ट्रक्चर और फॉर्मल लीगल रिकग्निशन में बड़े पॉलिसी रिकैलिब्रेशन के बिना बदलाव की संभावना कम है। इंडस्ट्री स्टेकहोल्डर्स टैक्स रैशनलाइजेशन की वकालत करना जारी रखे हुए हैं, जिसमें कम TDS और लॉस सेट-ऑफ की अनुमति शामिल है, साथ ही एक स्पष्ट रेगुलेटरी मैकेनिज्म की भी मांग है। सरकार का वर्तमान रुख सतर्कतापूर्ण दृष्टिकोण का सुझाव देता है, जो व्यापक VDA इंटीग्रेशन पर फाइनेंशियल स्टेबिलिटी और Oversight को प्राथमिकता देता है। यह रुख विदेशी प्लेटफॉर्म्स के पक्ष में घरेलू निवेशकों और इनोवेटर्स को और अलग-थलग करने का जोखिम रखता है।