FCA के नए क्रिप्टो नियम: 24 घंटे की सीमा बनी लाइसेंस का पेंच!

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AuthorNeha Patil|Published at:
FCA के नए क्रिप्टो नियम: 24 घंटे की सीमा बनी लाइसेंस का पेंच!
Overview

यूके का फाइनेंशियल रेगुलेटर, FCA (Financial Conduct Authority), क्रिप्टो एसेट्स के नियमों में बड़े बदलाव कर रहा है। एक अहम नियम के तहत, अब क्लाइंट एसेट्स को **24 घंटे** से ज़्यादा रखने वाली कंपनियों को लाइसेंस की ज़रूरत पड़ेगी। नोड ऑपरेटर्स को 'एडेड वैल्यू' सेवाएं देने पर टेक एग्ज़म्प्शन (tech exemptions) खत्म हो सकते हैं।

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यूके का वित्तीय नियामक, FCA, डिजिटल एसेट्स के रूल्स में ज़बरदस्त बदलाव लाने जा रहा है। नियामक ने कस्टडी (Custody) की परिभाषा को इस तरह से बदला है कि अब ज़्यादातर क्रिप्टो फर्में इसके दायरे में आ जाएंगी। इन नए प्रस्तावों का मकसद कंज्यूमर प्रोटेक्शन (consumer protection) और मार्केट में भरोसा बढ़ाना है, लेकिन यह क्रिप्टो कंपनियों के लिए बड़ी चुनौतियां पेश कर रहा है।

बदली हुई कस्टडी के नियम

FCA के नए प्रस्तावित नियमों के अनुसार, ट्रेड सेटलमेंट के दौरान क्लाइंट के क्रिप्टो एसेट्स को 24 घंटे तक होल्ड करने की सख्त सीमा तय की गई है। अगर कोई भी फर्म, चाहे वह अस्थायी रूप से ही क्यों न हो, क्लाइंट के एसेट्स को इस समय-सीमा से ज़्यादा रखती है, तो उसे एक रेगुलेटेड कस्टोडियन माना जाएगा और फुल सेफगार्डिंग लाइसेंस (safeguarding license) की ज़रूरत होगी। यह बदलाव उन प्लेटफॉर्म्स और सॉफ्टवेयर प्रोवाइडर्स के लिए एक झटका है जो पहले इस श्रेणी से बाहर थे। रेगुलेटर 'शैडो कस्टडी' (shadow custody) पर भी नज़र रखे हुए है। इसका मतलब है कि अगर किसी प्रोवाइडर के पास क्लाइंट के अधिकार को ओवरराइड (override) करने की सैद्धांतिक क्षमता भी है, तो उसे कस्टोडियन माना जाएगा, भले ही उसका इरादा ऐसा करने का न हो। FCA ने साफ कर दिया है कि डीसेंट्रलाइज्ड अरेंजमेंट्स (decentralized arrangements) या स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट्स (smart contracts) का इस्तेमाल फर्मों को रेगुलेशन से छूट नहीं दिलाएगा।

'एडेड वैल्यू' सेवाओं पर भी गाज

सिर्फ ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म ही नहीं, ये प्रस्ताव नोड ऑपरेटर्स (node operators) और वैलिडेटर्स (validators) को भी प्रभावित करेंगे। FCA का कहना है कि 'एडेड वैल्यू' वाली सेवाएं, जैसे यूजर डैशबोर्ड (user dashboards), यील्ड जनरेशन (yield generation), या रिवॉर्ड कंपाउंडिंग (reward compounding) जैसी सुविधाएं देने पर फर्मों के मौजूदा टेक एग्ज़म्प्शन (tech exemptions) खत्म हो जाएंगे। ऐसी सेवाएं देने वाली कंपनियों को अब स्टेकिंग (staking) के लिए अलग से अप्रूवल लेना होगा। इससे कई क्रिप्टो इकोसिस्टम में आम मानी जाने वाली सेवाओं पर कंप्लायंस (compliance) का बोझ बढ़ेगा, जो इनोवेशन (innovation) को धीमा कर सकता है।

स्टेबलकॉइन इश्यूअर्स (Stablecoin Issuers) के लिए यूके-आधारित होना ज़रूरी

स्टेबलकॉइन बनाने वाली कंपनियों के लिए भी FCA के नियम काफी सख्त हैं। इश्यूअंस (issuance) तभी कानूनी माना जाएगा जब इश्यूअर यूके में स्थित हो और स्टेबलकॉइन के पूरे लाइफसाइकिल (lifecycle) को मैनेज करे। इसमें शुरुआती ऑफरिंग (offering), रिडेम्पशन (redemption) और रिजर्व मैनेजमेंट (reserve management) शामिल है। इसके लिए कंपनी का यूके के भीतर मज़बूत ऑपरेशनल ढांचा और गवर्नेंस (governance) होना ज़रूरी है। यह नियम यूरोपीय यूनियन (EU) के MiCA रेगुलेशन की तरह ही है, जो स्टेबलकॉइन इश्यूअर्स के लिए सख्त ऑपरेशनल और रिजर्व रूल्स लागू करता है।

कड़े समय-सीमा और एप्लीकेशन विंडो

इन नए नियमों के लिए फर्मों के पास बहुत कम समय है। FCA इस गर्मी में फाइनल रूल्स और सितंबर 2026 में गाइडेंस (guidance) जारी करने की योजना बना रहा है। इसके बाद, कंपनियों को मौजूदा मनी-लॉन्ड्रिंग रजिस्ट्रेशन से हटकर यूके के फाइनेंशियल सर्विसेज एंड मार्केट्स एक्ट (FSMA) के तहत एक सख्त अप्रूवल सिस्टम में आना होगा। 30 सितंबर 2026 से पांच महीने की एक छोटी एप्लीकेशन विंडो खुलेगी, जो 28 फरवरी 2027 को बंद हो जाएगी। इस डेडलाइन (deadline) को मिस करने वाली फर्मों को भारी जुर्माने और ऑपरेशन सस्पेंड होने जैसी सज़ाओं का सामना करना पड़ सकता है। केवल इस अवधि के दौरान अप्लाई करने वाली फर्में ही अपने एप्लीकेशन के रिव्यू के दौरान 'सेविंग प्रोविज़न्स' (saving provisions) का उपयोग कर सकेंगी।

फर्मों पर संभावित असर

FCA के इन नए नियमों से यूके-आधारित क्रिप्टो फर्मों पर काफी असर पड़ने की उम्मीद है। कंपनियों को कंप्लायंस सिस्टम में बड़े निवेश की ज़रूरत होगी। यह बदलाव खासकर छोटी फर्मों के लिए मुश्किल हो सकता है, जिन्हें नए नियमों को पूरा करने के लिए ज़्यादा कंप्लायंस कॉस्ट (compliance cost) उठानी पड़ेगी। इस वजह से मार्केट में कंसॉलिडेशन (consolidation) बढ़ सकता है, क्योंकि बड़ी और अच्छी फंडिंग वाली फर्में ही इन बदलावों से आसानी से निपट पाएंगी।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.