भारतीय क्रिप्टो ट्रेडर्स अब स्पॉट ट्रेडिंग के 1% TDS से बचने के लिए फ्यूचर्स और डेरिवेटिव्स की ओर रुख कर रहे हैं। इन इंस्ट्रूमेंट्स का वॉल्यूम अब मार्केट में सबसे ज्यादा है, लेकिन चिंता की बात ये है कि करीब 70% ट्रेडर्स घाटे में चल रहे हैं। SEBI या RBI के सीधे रेगुलेशन न होने से रिटेल निवेशकों के लिए बड़े जोखिम खड़े हो गए हैं, खासकर हाई लिवरेज को लेकर।
टैक्स का खेल: फ्यूचर्स ट्रेडिंग में क्यों लगी भीड़?
भारतीय क्रिप्टोकरेंसी मार्केट में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। अब स्पॉट ट्रेडिंग की जगह फ्यूचर्स और डेरिवेटिव्स की ट्रेडिंग जोरों पर है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, घरेलू एक्सचेंजों पर अब कुल ट्रेडिंग वॉल्यूम का 80% से ज्यादा हिस्सा फ्यूचर्स और डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स का है।
इस बदलाव का मुख्य कारण है टैक्स का अंतर। 2022 के यूनियन बजट के बाद से स्पॉट क्रिप्टो ट्रेड्स पर 1% TDS लग रहा है, जबकि क्रिप्टो फ्यूचर्स पर फिलहाल यह टैक्स नहीं है। इसी वजह से ज्यादा वॉल्यूम वाले ट्रेडर्स (High-frequency traders) टैक्स बचाने और लागत कम करने के लिए फ्यूचर्स को तरजीह दे रहे हैं।
रिटेल निवेशकों के लिए बड़े खतरे: घाटा और हाई लिवरेज
भले ही फ्यूचर्स ट्रेडिंग में वॉल्यूम बढ़ रहा हो, लेकिन निवेशकों का हाल ठीक नहीं है। लोकल प्लेटफॉर्म्स के अंदरूनी आंकड़े बताते हैं कि करीब 70% से 80% डेरिवेटिव ट्रेडर्स को नुकसान हो रहा है। यह स्थिति काफी हद तक इक्विटी डेरिवेटिव्स जैसी है, जहां रिटेल निवेशक अक्सर बाजार की उठापटक में फंस जाते हैं।
बाजार के जानकारों के लिए सबसे बड़ी चिंता की बात इन प्लेटफॉर्म्स पर मिलने वाला लिवरेज (Leverage) है। कुछ छोटे क्रिप्टो एक्सचेंज फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट्स पर 100 गुना तक का लिवरेज दे रहे हैं। इसकी तुलना में, SEBI द्वारा रेगुलेट किए जाने वाले इक्विटी डेरिवेटिव्स में लिवरेज की सीमा आमतौर पर 5 गुना तक ही सीमित होती है। यह अंतर दिखाता है कि बिना रेगुलेशन वाले इस क्रिप्टो स्पेस में रिटेल निवेशकों के लिए कितना बड़ा खतरा है।
रेगुलेटरी गैप: RBI और SEBI की नजरों से दूर
भारत में क्रिप्टोकरेंसी अभी भी एक 'ग्रे एरिया' में है। इन्हें न तो आधिकारिक तौर पर करेंसी, कमोडिटी या सिक्योरिटी माना गया है, और न ही ये RBI या SEBI के सीधे रेगुलेशन के दायरे में आते हैं। इस वजह से, क्रिप्टो एक्सचेंज पारंपरिक स्टॉक एक्सचेंजों की तरह स्टैंडर्ड कंज्यूमर प्रोटेक्शन और ट्रांसपेरेंसी नियमों के बिना काम कर रहे हैं।
हालांकि, ऐसी खबरें हैं कि फाइनेंशियल स्टेबिलिटी एंड डेवलपमेंट काउंसिल (FSDC) ने रेगुलेटर्स को इस सेक्टर की समीक्षा करने के लिए प्रोत्साहित किया है, लेकिन अभी तक कोई खास आधिकारिक कदम नहीं उठाया गया है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर पारंपरिक सिक्योरिटीज की तरह एक फॉर्मल फ्रेमवर्क बनाया जाए, तो निवेशकों के हितों की रक्षा हो सकती है।
बिना इन नियमों के, निवेशकों को एक्सचेंज फेल होने, कीमतों में पारदर्शिता की कमी और डिजिटल एसेट्स की अस्थिरता जैसे जोखिमों का सामना करना पड़ रहा है। इस स्पेस में शामिल लोगों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे सरकारी नीतियों पर नजर रखें, क्योंकि कोई भी औपचारिक रेगुलेशन मौजूदा टैक्स ट्रीटमेंट और लिवरेज लिमिट्स को पूरी तरह बदल सकता है, जो फिलहाल फ्यूचर्स की ओर इस बड़े बदलाव का कारण बन रहे हैं।
