Mudrex के CEO Edul Patel का कहना है कि बॉन्ड्स और रियल एस्टेट जैसे एसेट्स का टोकनाइजेशन निवेश को आसान और लिक्विड बना सकता है। हालांकि, भारत में अभी इसके लिए कोई पक्का रेगुलेटरी फ्रेमवर्क नहीं है, जो निवेशकों के लिए कानूनी जोखिम पैदा करता है।
एसेट टोकनाइजेशन एक ऐसी तकनीक है जो रियल एस्टेट, बॉन्ड्स और गोल्ड जैसे फिजिकल एसेट्स को डिजिटल टोकन में बदलकर ब्लॉकचेन पर ट्रेड करने की सुविधा देती है। इसका मुख्य उद्देश्य निवेश प्रक्रिया को शेयर बाजार जितना आसान बनाना है। Mudrex के CEO Edul Patel के अनुसार, यह तकनीक लिक्विडिटी की कमी और ऊंचे ट्रांजैक्शन खर्च जैसी उन समस्याओं को दूर कर सकती है, जो छोटे निवेशकों को प्राइवेट डेट या रियल एस्टेट मार्केट से दूर रखती हैं।
छोटे निवेशकों के लिए बड़े मौके
इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा 'एक्सेसिबिलिटी' है। आज के समय में महंगी प्रॉपर्टी या बॉन्ड्स में निवेश करने के लिए भारी रकम और जटिल कागजी कार्रवाई की जरूरत होती है। टोकनाइजेशन के जरिए कोई भी निवेशक किसी बड़ी संपत्ति या बॉन्ड का एक छोटा हिस्सा खरीद सकेगा, बिल्कुल वैसे ही जैसे हम कंपनियों के शेयर खरीदते हैं। इससे रिटेल निवेशकों के लिए नए इन्वेस्टमेंट रास्ते खुल सकते हैं।
कानून और रेगुलेशन का पेंच
हालांकि, भारतीय निवेशकों के लिए स्थिति अभी काफी उलझी हुई है। हमारे यहाँ किसी भी प्रॉपर्टी या एसेट के मालिकाना हक के लिए फिजिकल रजिस्ट्री अनिवार्य है। अगर कोई डिजिटल प्लेटफॉर्म किसी तकनीकी खराबी या धोखाधड़ी का शिकार हो जाता है, तो कानून की अदालत में यह साबित करना बेहद मुश्किल होगा कि उस डिजिटल टोकन के पीछे की असली संपत्ति आपकी है।
RBI और SEBI का रुख
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) और SEBI जैसे रेगुलेटर्स डिजिटल एसेट्स को लेकर अभी काफी सतर्क हैं। फिलहाल ऐसा कोई स्पष्ट कानूनी ढांचा नहीं है जो इन टोकन्स को फिजिकल एसेट का वैध प्रूफ माने। इसमें पारंपरिक इक्विटी मार्केट जैसा उपभोक्ता संरक्षण (Consumer Protection) भी नहीं है। जब तक सरकार या रेगुलेटर इसे लेकर कोई लीगल फ्रेमवर्क या 'सैंडबॉक्स' नहीं लाते, तब तक यह मार्केट एक एक्सपेरिमेंटल स्टेज में ही रहेगा। निवेशकों को SEBI और RBI की ओर से आने वाले गाइडलाइन्स पर नजर रखने की सलाह है, क्योंकि असली सुरक्षा तकनीक से ज्यादा कानून से मिलेगी।
