Uttar Pradesh का 'One District One Cuisine' प्लान: ₹75 करोड़ के बजट में 75 जिलों के 208 पारंपरिक व्यंजन होंगे प्रमोट

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
Uttar Pradesh का 'One District One Cuisine' प्लान: ₹75 करोड़ के बजट में 75 जिलों के 208 पारंपरिक व्यंजन होंगे प्रमोट

उत्तर प्रदेश सरकार ने 'वन डिस्ट्रिक्ट वन क्यूज़ीन' (ODOC) पहल की शुरुआत की है। इस योजना के तहत, राज्य के 75 जिलों के 208 पारंपरिक खाद्य पदार्थों को बढ़ावा दिया जाएगा, जिसके लिए 2026-27 के फाइनेंशियल ईयर में ₹75 करोड़ का बजट रखा गया है। यह प्रोग्राम स्थानीय पाक विरासत को सहारा देने के लिए ब्रांडिंग और मार्केट एक्सेस पर फोकस करेगा, हालांकि इसमें सीधे तौर पर किसी बिज़नेस को फाइनेंशियल ग्रांट नहीं मिलेगा।

'वन डिस्ट्रिक्ट वन क्यूज़ीन' का आगाज़

उत्तर प्रदेश सरकार ने स्थानीय पाक परंपराओं को औपचारिक बाज़ार से जोड़ने के लिए 'वन डिस्ट्रिक्ट वन क्यूज़ीन' (ODOC) योजना का ऐलान किया है। 24 जनवरी, 2026 को राज्य के फाउंडेशन डे के मौके पर लॉन्च हुई इस स्कीम में राज्य के सभी 75 जिलों के 208 पारंपरिक फ़ूड आइटम्स को शामिल किया गया है। इस पहल का मकसद इन रीजनल डिशेज़ को बेहतर ब्रांडिंग, क्वालिटी कंट्रोल और बड़े मार्केट तक पहुँच दिलाना है।

बजट और मुख्य उद्देश्य

2026-27 के फाइनेंशियल ईयर के लिए, राज्य सरकार ने ODOC फ्रेमवर्क को लागू करने के लिए ₹75 करोड़ का फंड तय किया है। यह समझना ज़रूरी है कि यह एक पॉलिसी-बेस्ड इकोनॉमिक प्रोग्राम है, न कि कोई कॉर्पोरेट प्रोजेक्ट। इस पैसे का इस्तेमाल इकोसिस्टम बनाने में होगा, जैसे कि मार्केटिंग, पैकेजिंग सपोर्ट और क्वालिटी टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर। किसी भी अकेले रेस्तरां या फ़ूड प्रोड्यूसर को सीधे कैश असिस्टेंस नहीं दिया जाएगा। यह प्रोग्राम राज्य की पहले की 'वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट' (ODOP) पहल की सफलता को दोहराने की कोशिश करेगा, जिसने इंडस्ट्रियल गुड्स और हैंडीक्राफ्ट्स पर फोकस किया था।

बिज़नेस के लिए अवसर

राज्य के लोकल फ़ूड बिज़नेस और छोटे एंटरप्राइजेज़ के लिए यह पहल स्केल-अप करने का एक मौका है। इन 208 डिशेज़ के लिए एक ऑफिशियल फ्रेमवर्क बनाकर, सरकार उन छोटे प्रोड्यूसर्स के लिए बाधाएं कम करना चाहती है जिन्हें ब्रांडिंग या डिस्ट्रीब्यूशन में दिक्कत आती है। अगर यह प्लान ठीक से लागू होता है, तो रीजनल फ़ूड आइटम्स शहरी बाज़ारों और टूरिस्ट्स तक पहुँच सकते हैं, जिससे लोकल सप्लायर्स की कमाई बढ़ सकती है। हालांकि, किसी भी फ़ूड बिज़नेस की कमर्शियल सक्सेस उसके स्टैंडर्ड बिज़नेस मेट्रिक्स पर निर्भर करेगी, जैसे ऑपरेशनल एफिशिएंसी, सप्लाई चेन की कंसिस्टेंसी और कंज्यूमर डिमांड में बदलाव।

चुनौतियाँ और बहस

इस स्कीम को लेकर पब्लिक और कल्चरल डिबेट भी शुरू हो गई है, खासकर डिशेज़ के सेलेक्शन को लेकर। लिस्ट में नॉन-वेज आइटम्स को शामिल न किए जाने पर सवाल उठाए गए हैं। ऑपरेशनल लेवल पर, स्कीम की लॉन्ग-टर्म सक्सेस लोकल प्रोड्यूसर्स की फ़ूड सेफ्टी स्टैंडर्ड्स और प्रोडक्ट क्वालिटी को बनाए रखने की क्षमता पर निर्भर करेगी, खासकर जब प्रोडक्शन बढ़ेगा। इसके अलावा, सरकार प्रमोशन का प्लेटफॉर्म तो देगी, लेकिन छोटे बिज़नेस को अपने प्रोडक्शन रिस्क खुद मैनेज करने होंगे, क्योंकि सरकार का रोल सपोर्टिव और प्रमोशनल रहेगा, न कि डिमांड या प्रॉफिट की गारंटी देने वाला।

इन्वेस्टर्स और रीजनल इकोनॉमी पर नज़र रखने वालों को इस प्रोग्राम के रोलआउट के दौरान सरकारी डिस्ट्रीब्यूशन और मार्केटिंग सपोर्ट की इफेक्टिवनेस पर ध्यान देना चाहिए। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या यह फ्रेमवर्क वाकई में लोकल फ़ूड एंटरप्राइजेज़ के लिए सेल्स बढ़ाने में कामयाब होता है या यह सिर्फ़ ब्रांडिंग और अवेयरनेस तक ही सीमित रहता है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.