2026 के मध्य तक शहरी FMCG बिक्री में **13%** का उछाल देखा गया है। गौर करने वाली बात यह है कि यह ग्रोथ वॉल्यूम के कारण नहीं, बल्कि महंगाई के चलते बढ़ी कीमतों की वजह से है। खरीदारी की फ्रीक्वेंसी घटने से अब निवेशकों की नजरें टिकाऊ वॉल्यूम ग्रोथ पर टिकी हैं।
शहरी भारतीय परिवारों के खरीदारी के तरीके में बड़ा बदलाव आया है, जो निवेशकों के लिए चिंता का विषय हो सकता है। जून 2026 तक FMCG सेक्टर की वैल्यू सेल्स में 13% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, लेकिन इसकी असल वजह खपत का बढ़ना नहीं है। इसके बजाय, महंगाई के कारण प्रोडक्ट्स की कीमतें बढ़ने से लोग ज्यादा पैसे खर्च करने को मजबूर हैं।
आंकड़ों में छिपा सच
जून 2026 तक के आंकड़ों के मुताबिक, प्रति शॉपिंग ट्रिप पर होने वाला खर्च 11.5% बढ़ गया है, लेकिन स्टोर पर जाने की संख्या में 1.8% की गिरावट आई है। इसका मतलब साफ है कि ग्राहक अब स्टोर पर कम जा रहे हैं। निवेशकों के लिए संकेत साफ है: ज्यादातर FMCG कंपनियां वॉल्यूम बढ़ाने के बजाय दाम बढ़ाकर रेवेन्यू दिखा रही हैं।
रिटेल का बदलता चेहरा
परंपरागत किराना स्टोर अभी भी बाजार में 77% हिस्सेदारी के साथ सबसे आगे हैं, लेकिन डिजिटल प्लेटफॉर्म्स तेजी से पैर पसार रहे हैं। ऑनलाइन चैनल्स की वैल्यू सेल्स 48.9% तक बढ़ गई है, जिससे इनका मार्केट शेयर 3% से बढ़कर 4% हो गया है।
मार्जिन का दबाव और चुनौतियां
पर्सनल केयर सेगमेंट ने 16.3% की वैल्यू ग्रोथ के साथ बेहतर प्रदर्शन किया है। हालांकि, पूरे सेक्टर पर कच्चा माल, जैसे पाम ऑयल और क्रूड-लिंक्ड डेरिवेटिव्स की बढ़ती लागत का भारी दबाव है। कंपनियां चाहकर भी इसे पूरी तरह ग्राहकों पर नहीं डाल पा रही हैं, जिससे मुनाफे (Margins) पर असर पड़ रहा है।
आने वाले समय में, कंपनियों का 'वॉल्यूम ग्रोथ' जेनरेट कर पाना ही असली परीक्षा होगी। यदि रेवेन्यू केवल कीमतों के भरोसे बढ़ रहा है, तो लॉन्ग-टर्म में शेयरों की हेल्थ के लिए यह चुनौती बनी रह सकती है।
