कॉम्पिटीटर्स की कमजोरी ही Unilever का बड़ा मौका
कंज्यूमर गुड्स सेक्टर में इन्फ्लेशन (Inflation) यानी महंगाई नए समीकरण बना रही है। Unilever का मानना है कि खासकर भारत जैसे बाजारों में, जहां सप्लाई चेन (Supply Chain) की दिक्कतें छोटे लोकल ब्रांड्स को परेशान कर रही हैं, वहां बड़ी कंपनियां अपनी लागत बढ़ा सकती हैं और मार्केट शेयर (Market Share) हासिल कर सकती हैं। कंपनी के CFO Srinivas Phatak का कहना है कि छोटे ब्रांड्स अक्सर सप्लाई और कैश फ्लो (Cash Flow) की चुनौतियों से जूझते हैं, जिससे Unilever जैसी बड़ी कंपनियों को होम केयर (Home Care) जैसे सेगमेंट्स में फायदा मिलता है। कंपनी ने बॉडी वॉश (Body Wash) सेगमेंट में पहले ही 400 बेसिस पॉइंट का शेयर हासिल किया है, जो बताता है कि प्रीमियम सेगमेंट्स में भी ग्रोथ आ रही है। यह माहौल Unilever के लिए तब फायदेमंद हो सकता है जब बढ़ती लागत के कारण मार्केट कंसॉलिडेट (Consolidate) हो।
इमर्जिंग मार्केट्स में प्राइसिंग का पेच
हालांकि, बड़ी कंपनियों के लिए प्राइस कंपटीशन कम हो सकता है, लेकिन इमर्जिंग मार्केट्स (Emerging Markets) में महंगाई का सीधा असर (होमकेयर की लागत का 70%) एक मुश्किल संतुलन बना रहा है। Unilever का अनुमान है कि इस साल इन्फ्लेशन की लागत 750 मिलियन से 900 मिलियन यूरो तक पहुंच सकती है, अगर क्रूड ऑयल (Crude Oil) की कीमत $100 प्रति बैरल पर बनी रहती है। सप्लाई चेन पर भरोसा होने के बावजूद, कुछ इमर्जिंग मार्केट्स में पहले से ही प्राइस एडजस्टमेंट (Price Adjustment) देखे जा रहे हैं, क्योंकि कंपनियां ग्राहकों पर बढ़ती जीवन लागत का दबाव कम करने की कोशिश कर रही हैं। इसका मतलब है कि Unilever को जरूरी प्राइस इंक्रीज (Price Increase) और कीमत-संवेदनशील (Price-sensitive) ग्राहकों को खोने के जोखिम के बीच सावधानी से संतुलन बनाना होगा। कंपनी 'कैलिब्रेटेड इंक्रीज' (Calibrated Increases) का सहारा लेगी, लेकिन महंगाई एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। पुराने अनुभव बताते हैं कि 2022 की पहली तिमाही में जब Unilever ने कीमतें 8.3% बढ़ाई थीं, तो वॉल्यूम (Volume) 1.0% गिर गया था।
कम वैल्यूएशन और एनालिस्ट्स की चिंता
Unilever का करंट मार्केट वैल्यूएशन (Market Valuation) कंपनी के ऑपरेशनल स्केल से थोड़ा कम लगता है। इसकी मार्केट कैप लगभग 126-127 बिलियन डॉलर है, और P/E रेश्यो (P/E Ratio) 11.25 से 11.39 के बीच है। यह P/E रेश्यो कंपनी के ऐतिहासिक औसत से काफी कम है और Procter & Gamble (लगभग 21-22) और Nestlé (लगभग 23) जैसे प्रतिद्वंद्वियों से भी बहुत पीछे है। यह कम वैल्यूएशन प्रॉफिट मार्जिन (Profit Margin) की सस्टेनेबिलिटी (Sustainability) पर मार्केट के संदेह, रीस्ट्रक्चरिंग (Restructuring) और पोर्टफोलियो (Portfolio) बदलावों के जोखिम या कर्ज के स्तर को लेकर चिंताओं का नतीजा हो सकता है। इमर्जिंग मार्केट्स सेल्स के लिए अहम हैं, लेकिन वे करेंसी (Currency) और जियोपॉलिटिकल (Geopolitical) जोखिम भी लाते हैं। एनालिस्ट्स (Analysts) की राय बंटी हुई है, ज्यादातर 'होल्ड' (Hold) रेटिंग दे रहे हैं, लेकिन प्राइस टारगेट्स (Price Targets) में काफी अंतर है। कुछ एनालिस्ट इमर्जिंग मार्केट की प्राइसिंग और प्रॉफिट की कमजोरी को लेकर 'सेल' (Sell) रेटिंग बनाए हुए हैं। कंपनी रीस्ट्रक्चरिंग से भी गुजर रही है, जिसमें फूड्स डिविजन (Foods Division) को McCormick & Co. के साथ मिलाना और आइसक्रीम बिजनेस (Ice Cream Business) को स्पिन-ऑफ (Spin-off) करना शामिल है, जिससे कॉम्प्लेक्सिटी (Complexity) और लागत बढ़ रही है।
ग्रोथ की उम्मीदें और मार्जिन का भविष्य
इन्फ्लेशन और मार्केट की अनिश्चितता के बावजूद, Unilever नए ग्रोथ एरियाज (Growth Areas) में निवेश कर रही है। डायरेक्ट सेल्स चैनल्स (Direct Sales Channels) में ग्रोथ देखी गई है, खासकर भारत में मॉडर्न ट्रेड (Modern Trade) और क्विक कॉमर्स (Quick Commerce) सेगमेंट्स में। ये चैनल्स ग्रोथ का बड़ा हिस्सा चला रहे हैं। Unilever फुल-ईयर अंडरलाइंग सेल्स ग्रोथ (Underlying Sales Growth) के अपने 4%-6% के अनुमान के निचले सिरे पर रहने की उम्मीद कर रही है, जिसमें कम से कम 2% वॉल्यूम ग्रोथ शामिल है। कंपनी साल के लिए अपने अंडरलाइंग ऑपरेटिंग मार्जिन (Underlying Operating Margin) में मामूली बढ़ोतरी की भी उम्मीद करती है। यह मैनेजमेंट के लागत प्रबंधन और पैमाने का उपयोग करने के आत्मविश्वास को दर्शाता है, बशर्ते कि प्रतिद्वंद्वियों की कमजोरी से होने वाले फायदे, अस्थिर इमर्जिंग मार्केट्स से होने वाले जोखिमों से ज्यादा हों।
