TABP Snacks का बड़ा प्लान: ₹800 करोड़ रेवेन्यू का लक्ष्य, जानिए क्या है स्ट्रेटेजी और रिस्क

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
TABP Snacks का बड़ा प्लान: ₹800 करोड़ रेवेन्यू का लक्ष्य, जानिए क्या है स्ट्रेटेजी और रिस्क
Overview

TABP Snacks एंड बेवरेजेज ने अगले तीन सालों में **₹800 करोड़** का रेवेन्यू हासिल करने का बड़ा लक्ष्य रखा है। कंपनी 'बॉटम ऑफ द पिरामिड' यानी कम आय वर्ग के ग्राहकों को किफायती और हाइजीनिक पेय पदार्थ (beverages) बेचने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है।

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छोटे शहरों और गांवों को टारगेट

TABP Snacks एंड बेवरेजेज (TABP Snacks and Beverages) अपने रेवेन्यू को अगले तीन सालों में ₹800 करोड़ तक ले जाने की तैयारी में है। कंपनी का मुख्य फोकस कम आय वर्ग के उपभोक्ताओं पर है, जिन्हें वे किफायती और सुरक्षित बेवरेजेज उपलब्ध कराना चाहती है। मौजूदा फाइनेंशियल ईयर 2026 (FY26) में कंपनी का रेवेन्यू ₹208 करोड़ है, जबकि FY27 के लिए यह ₹300-350 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है।

'बॉटम ऑफ द पिरामिड' तक पहुंच

कंपनी के को-फाउंडर और सीईओ Prabhu Gandhikumar ने बताया कि उनकी कंपनी उन ग्राहकों को टारगेट कर रही है जिनकी दैनिक आय करीब ₹500 है और वे स्वच्छ, ताज़गी भरे पेय (refreshing drinks) की तलाश में रहते हैं। TABP का 'Plunge' ब्रांड सोडा और लोकल फ्लेवर वाले ड्रिंक्स पेश करता है, जिनकी कीमत ज्यादातर ₹10 रखी गई है। यह सीधे तौर पर लोकल स्ट्रीट वेंडर्स को टक्कर देगा। तमिलनाडु फिलहाल कंपनी का सबसे बड़ा मार्केट है, जो बिक्री का 42% हिस्सा है। अब कंपनी गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड और पश्चिम बंगाल जैसे नए राज्यों में भी विस्तार करने की योजना बना रही है। यह विस्तार अपने मुख्य बाजार (70% बिक्री) में ग्रोथ को बनाए रखने के साथ-साथ नए राज्यों (30% बिक्री का लक्ष्य) में पैठ बनाने पर केंद्रित होगा।

प्रोडक्शन और डिस्ट्रीब्यूशन को बढ़ाना

फिलहाल TABP के 16 प्रोडक्शन साइट्स हैं, जिनमें से सिर्फ 1 ही कंपनी के मालिकाना हक का है। बाकी अधिकतर उत्पादन थर्ड-पार्टी निर्माताओं से कराया जाता है, जो प्रति मिनट करीब 3,000 बोतलें तैयार करते हैं। कंपनी अगले तीन सालों में ₹70-80 करोड़ का निवेश करके 4 से 6 नई मैन्युफैक्चरिंग प्लांट लगाने की योजना बना रही है। इससे कंपनी का अपने प्लांट से उत्पादन 25% तक बढ़ जाएगा, जिससे लागत और मार्जिन्स पर बेहतर कंट्रोल मिल सकेगा। TABP अपनी 100% ऑफलाइन सेल्स की रणनीति पर कायम है और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से दूर है, क्योंकि ₹50 से कम कीमत वाले उत्पादों के लिए लॉजिस्टिक्स को बहुत महंगा माना जाता है। यह रणनीति ग्रामीण और अर्ध-शहरी ग्राहकों तक पहुंचने के लिए अहम है, लेकिन बड़े इलाकों में डिस्ट्रीब्यूशन एक बड़ी चुनौती पेश करती है।

बाजार की स्थिति और प्रतिस्पर्धा

TABP की स्ट्रेटेजी भारत के बड़े ग्रामीण उपभोक्ता आधार का फायदा उठाना चाहती है, जहाँ आय बढ़ रही है और ब्रांडेड, क्वालिटी उत्पादों की मांग बढ़ रही है। Parle Agro जैसी कंपनियों ने पहले ही किफायती ड्रिंक्स के लिए बड़े डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क बनाकर सफलता हासिल की है। भारत का पूरा बेवरेज मार्केट अरबों डॉलर का है और Coca-Cola India और PepsiCo India जैसे बड़े प्लेयर्स के साथ-साथ कई रीजनल ब्रांड्स और अनऑर्गेनाइज्ड सेक्टर से कड़ी प्रतिस्पर्धा है। चीनी और PET पैकेजिंग जैसे रॉ मैटेरियल्स की कीमतों में उतार-चढ़ाव भी कम कीमत वाले ड्रिंक्स बेचने वाली कंपनियों के मार्जिन्स को प्रभावित करता है।

आगे की राह और मुख्य जोखिम

हालांकि, TABP की आक्रामक ग्रोथ प्लानिंग कई बड़े जोखिमों का सामना कर रही है। सबसे बड़ी चिंता उत्पादन मॉडल की है, जिसमें 16 में से 15 यूनिट थर्ड-पार्टी के हैं। इससे प्रोडक्ट की क्वालिटी में असंगतता और सप्लाई चेन में कमजोरी आ सकती है। भले ही कंपनी अपने प्लांट बढ़ाने की योजना बना रही है, लेकिन इसके लिए काफी निवेश और समय लगेगा। ₹10 के ड्रिंक की इकोनॉमिक्स बढ़ती लागतों के साथ चुनौतीपूर्ण हो जाती है। ज्यादा रिसोर्स और मौजूदा डिस्ट्रीब्यूशन वाले कंपटीटर किसी भी ग्रोथ को आसानी से चुनौती दे सकते हैं। नए राज्यों में विस्तार के लिए भारी डिस्ट्रीब्यूशन निवेश की जरूरत होगी, जो कंपनी के कम मालिकाना एसेट्स और ऑफलाइन फोकस को देखते हुए एक जटिल काम है। भारत का FMCG सेक्टर बेहद प्रतिस्पर्धी है; कम कीमत वाली चीजों के प्रति ग्राहकों की वफादारी बनाए रखने के लिए लगातार लागत नियंत्रण और नए आइडिया की जरूरत होगी, जो TABP के मौजूदा स्केल को देखते हुए मुश्किल हो सकता है। अनऑर्गेनाइज्ड बेवरेज सेक्टर में फूड सेफ्टी को लेकर रेगुलेटरी जांच का जोखिम भी बना हुआ है।

TABP का तीन साल में ₹800 करोड़ रेवेन्यू का लक्ष्य महत्वाकांक्षी है और यह बाजार में अपनी पहुंच और डिस्ट्रीब्यूशन को सफलतापूर्वक बढ़ाने पर निर्भर करेगा। एक बड़े और अभी तक ठीक से सर्व नहीं किए गए उपभोक्ता वर्ग पर फोकस करने से ग्रोथ का एक स्पष्ट रास्ता तो दिखता है, लेकिन सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि कंपनी थर्ड-पार्टी मेकर्स से खुद के उत्पादन की ओर कितनी जल्दी बढ़ पाती है, बदलती अर्थव्यवस्था में लागतों को कैसे मैनेज करती है, और नए राज्यों में मजबूत डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क कैसे बनाती है। ये फैक्टर एक संभावित IPO के लिए कंपनी की तैयारी को भी तय करेंगे। एनालिस्ट रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत का रूरल FMCG मार्केट भले ही बढ़ रहा हो, लेकिन ऑपरेशनल एफिशिएंसी और मजबूत सप्लाई चेन ही लंबे समय तक मुनाफे की गारंटी दे सकते हैं।

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