स्विट्जरलैंड की लग्जरी घड़ियों के लिए भारत अब टॉप 15 ग्लोबल डेस्टिनेशन में शामिल हो गया है। 2026 की पहली छमाही में, भारत ने **16.87 करोड़ स्विस फ्रैंक** (लगभग ₹1,991 करोड़) की घड़ियां आयात कीं, जो पिछले साल की समान अवधि से **31%** ज्यादा है। यह बढ़ोतरी नए लग्जरी खरीदारों की बढ़ती संख्या और भारत-स्विट्जरलैंड व्यापार समझौते का नतीजा है।
Detailed Coverage
भारत में बढ़ी लग्जरी घड़ियों की मांग
स्विट्जरलैंड की घड़ी इंडस्ट्री के लिए भारत एक उभरता हुआ बड़ा मार्केट बन गया है। 2026 की पहली छमाही में, भारत टॉप 15 ग्लोबल एक्सपोर्ट डेस्टिनेशंस में शामिल हो गया है। इस दौरान देश में 2 लाख स्विस घड़ियां इम्पोर्ट हुईं, जो पिछले साल के मुकाबले 37% ज्यादा है। वैल्यू के हिसाब से देखें तो इम्पोर्ट 31% बढ़कर 16.87 करोड़ स्विस फ्रैंक (लगभग ₹1,991 करोड़) तक पहुंच गया। यह तब हुआ है जब स्विट्जरलैंड की ग्लोबल वॉच एक्सपोर्ट्स में मामूली 0.7% की गिरावट आई है।
व्यापार समझौते का बड़ा असर
इस ग्रोथ के पीछे भारत-स्विट्जरलैंड ट्रेड एंड इकोनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट (TEPA) का बड़ा हाथ है। अक्टूबर 2025 से लागू हुए इस समझौते ने स्विट्जरलैंड से होने वाले इम्पोर्ट पर टैरिफ (सीमा शुल्क) कम कर दिया है। कम ड्यूटी के कारण हाई-एंड लग्जरी घड़ियां अब ज्यादा किफायती हो गई हैं, जिसका सीधा फायदा ग्लोबल वॉच ब्रांड्स और उनके इंडियन रिटेल पार्टनर्स को मिला है। हालांकि, करेंसी में उतार-चढ़ाव और कीमती धातुओं की बढ़ती लागत ने इम्पोर्ट वैल्यू को प्रभावित किया है, लेकिन घड़ियों की बिक्री का वॉल्यूम (मात्रा) इस बात का सबूत है कि मार्केट में डिमांड वाकई बढ़ी है।
अमीरों की बढ़ती संख्या और रिटेल का विस्तार
यह बढ़ती डिमांड सिर्फ पुराने कलेक्टर्स तक ही सीमित नहीं है, बल्कि नए लग्जरी खरीदारों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है। मार्केट एनालिस्ट्स का कहना है कि भारत में बढ़ती पर्सनल वेल्थ (व्यक्तिगत संपत्ति) और मिडिल क्लास की बढ़ती परचेजिंग पावर (खरीद शक्ति) इस ट्रेंड के मुख्य कारण हैं। रिटेल नेटवर्क भी इस हाई-वैल्यू प्रोडक्ट्स की ओर बढ़ते रुझान को भुनाने के लिए अपनी पहुंच बढ़ा रहे हैं। उदाहरण के लिए, लग्जरी वॉच रिटेलर Ethos ने अपने स्टोर्स की संख्या 100 से ज्यादा कर ली है, जो भारतीय रिटेल मार्केट में ब्रांड्स के बढ़ते भरोसे को दिखाता है।
प्रीमियम सेग्मेंट्स में जोरदार ग्रोथ
लग्जरी सेग्मेंट में कुल मिलाकर ग्रोथ देखी जा रही है, लेकिन सबसे तेज बढ़ोतरी 10 लाख रुपये से ऊपर की घड़ियों में हुई है, उसके बाद 5-10 लाख रुपये वाली कैटेगरी का नंबर आता है। कई भारतीय कंज्यूमर प्रीमियम घड़ियों को इन्वेस्टमेंट एसेट (निवेश संपत्ति) के तौर पर भी देख रहे हैं, जिसने हाई प्राइस पॉइंट्स पर भी सेल्स ग्रोथ को सपोर्ट किया है। TAG Heuer, Tissot, और Rado जैसे ग्लोबल ब्रांड्स भारत को प्राथमिकता दे रहे हैं और डोमेस्टिक मार्केट की डिमांड को पूरा करने के लिए यहां महंगे मॉडल्स भेज रहे हैं।
आगे चलकर, इस ग्रोथ की निरंतरता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या कंज्यूमर डिमांड लग्जरी खर्च के पैटर्न में संभावित उतार-चढ़ाव के बावजूद स्थिर रहती है। इन्वेस्टर्स इस बात पर नजर रख सकते हैं कि बड़े लग्जरी रिटेलर्स अपने स्टोर विस्तार की लागत को कैसे मैनेज करते हैं और TEPA के तहत टैरिफ में लगातार कटौती रिटेलर्स और डिस्ट्रीब्यूटर्स के प्रॉफिट मार्जिन को आने वाली तिमाहियों में कैसे सपोर्ट करती है।
