भारत में स्विस वॉच की डिमांड तेजी से बढ़ रही है। साल 2026 के पहले 9 महीनों में एक्सपोर्ट **28.5%** बढ़कर **₹3,050 करोड़** के पार पहुंच गया है। अब ग्लोबल ब्रांड्स भारतीयों को लुभाने के लिए 'इंडिया-स्पेसिफिक' डिजाइन लॉन्च कर रहे हैं, जिसमें India-EFTA ट्रेड पैक्ट का बड़ा सपोर्ट मिल रहा है।
भारत अब ग्लोबल मार्केट में स्विस वॉच एक्सपोर्ट के लिए 14वां सबसे बड़ा देश बन चुका है, जो पिछले साल 20वें नंबर पर था। फेडरेशन ऑफ द स्विस वॉच इंडस्ट्री के आंकड़ों के मुताबिक, इस साल के पहले नौ महीनों में भारत में 266.4 मिलियन स्विस फ्रैंक यानी करीब ₹3,050 करोड़ की घड़ियों का एक्सपोर्ट हुआ है।
भारतीय कलेक्टर्स की बदलती पसंद
अब लग्जरी ब्रांड्स सिर्फ ग्लोबल इमेज पर निर्भर नहीं हैं। TAG Heuer, Jacob & Co. और Franck Muller जैसे बड़े नाम अब घड़ियों में भारतीय संस्कृति और कला को जोड़ रहे हैं। इन कस्टमाइज्ड घड़ियों की कीमत ₹5.76 लाख से शुरू होकर ₹4 करोड़ से भी ऊपर तक जाती है। खास बात यह है कि फाइनल प्रोडक्ट देखने से पहले ही कलेक्टर्स ने इनकी भारी बुकिंग शुरू कर दी है।
ट्रेड पॉलिसी का मिल रहा फायदा
अक्टूबर 2025 में लागू हुए India-EFTA ट्रेड एग्रीमेंट ने इस बाजार की तस्वीर बदल दी है। स्विस वॉच पर लगने वाली कस्टम ड्यूटी को धीरे-धीरे कम किया जा रहा है, जो 18.9% से घटकर 15.71% पर आ गई है। लक्ष्य जनवरी 2031 तक इसे शून्य करने का है। इससे दुबई या जिनेवा जैसी जगहों और भारत में मिलने वाली घड़ियों की कीमत का अंतर कम हो रहा है, जिससे बिक्री अब घरेलू बाजार में ही रहने की उम्मीद है।
निवेश के जोखिम (Risks)
बाजार की चमक के बावजूद निवेशकों को यह समझना होगा कि यह एक 'निश' (niche) मार्केट है। इनकी मांग बहुत कम और रईस लोगों पर निर्भर करती है। इकोनॉमी में सुस्ती आने पर सबसे पहले लग्जरी खर्च पर ही असर पड़ता है। इसके अलावा, ब्रांड्स का प्रोडक्शन साइकिल 3 साल तक का होता है, इसलिए अगर बाजार का मिजाज बदला, तो इन्वेंट्री जमा होने का खतरा बना रहता है।
