सुप्रीम कोर्ट 10 सितंबर, 2026 को FSSAI के फूड लेबलिंग नियमों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करेगा। इस मामले से भारतीय पैकेज्ड फूड इंडस्ट्री के लिए रेगुलेटरी जोखिम बढ़ सकते हैं।
भारतीय पैकेज्ड फूड इंडस्ट्री के लिए आने वाला समय चुनौतीपूर्ण हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट में '3S And Our Health' नाम के एक नॉन-प्रॉफिट ग्रुप ने FSSAI के उस प्रस्ताव को चुनौती दी है, जिसमें 'रेड हेक्सागोनल' वार्निंग लेबल लगाने के नियम तय किए गए हैं। वर्तमान प्रस्ताव के अनुसार, वार्निंग लेबल तभी जरूरी है जब चीनी, नमक या सैचुरेटेड फैट में से कम से कम दो पैरामीटर तय सीमा से अधिक हों।
लूपहोल और विवाद की वजह
हेल्थ एक्टिविस्ट्स का तर्क है कि 'टू-न्यूट्रिएंट' का यह नियम एक बड़ा लूपहोल है। इससे कई ऐसे प्रोडक्ट बच सकते हैं जिनमें सिर्फ एक हानिकारक तत्व बहुत अधिक मात्रा में है। कोर्ट ने पहले ही अगस्त 2026 में रेगुलेशन की धीमी रफ्तार पर चिंता जताई थी, जिससे यह पूरा सेक्टर सरकार की कड़ी निगरानी में आ गया है।
इंडस्ट्री पर क्या होगा असर?
$100 बिलियन से अधिक के भारतीय फूड एंड बेवरेज मार्केट के लिए यह कानूनी लड़ाई अनिश्चितता लेकर आई है। यदि सुप्रीम कोर्ट सख्त लेबलिंग के निर्देश देता है, तो कंपनियों को अपनी पैकेजिंग को तुरंत बदलना पड़ सकता है और प्रोडक्ट की रेसिपी में भी बदलाव करना पड़ सकता है, ताकि उन्हें 'वार्निंग लेबल' से बचाया जा सके।
चिली जैसे देशों के अनुभवों से संकेत मिलता है कि सख्त लेबलिंग के बाद कंज्यूमर डिमांड में गिरावट आती है। ऐसे में निवेशक इस सुनवाई पर बारीक नजर बनाए हुए हैं, क्योंकि इससे कंपनियों के प्रोडक्शन कॉस्ट और ब्रांड पोजिशनिंग पर सीधा असर पड़ सकता है।
