Food Labeling: सुप्रीम कोर्ट का FSSAI को अल्टीमेटम, 10 सितंबर की सुनवाई से पहले सख्त नियम जरूरी

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
Food Labeling: सुप्रीम कोर्ट का FSSAI को अल्टीमेटम, 10 सितंबर की सुनवाई से पहले सख्त नियम जरूरी

सुप्रीम कोर्ट ने FSSAI के फूड लेबलिंग नियमों को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने जटिल आंकड़ों के बजाय पैकेट के सामने साफ हेल्थ वार्निंग देने का आदेश दिया है, जिससे FMCG कंपनियों की चिंता बढ़ गई है।

भारत के सुप्रीम कोर्ट ने फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) पर फूड लेबलिंग नियमों को लेकर दबाव बढ़ा दिया है। '3S' और 'आवर हेल्थ सोसाइटी' द्वारा दायर एक मामले की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने रेगुलेटर के पुराने प्रस्तावों पर असंतोष जताया है, जिसमें पैकेजिंग पर केवल न्यूमरिकल (संख्यात्मक) डेटा देने की बात कही गई थी। कोर्ट का मानना है कि आम उपभोक्ता के लिए ये आंकड़े समझना मुश्किल है, इसलिए कोर्ट ने प्रोडक्ट में चीनी, नमक या फैट की मात्रा अधिक होने पर फ्रंट-ऑफ-पैक (FOP) पर साफ चेतावनी वाले सिंबल लगाने के निर्देश दिए हैं।

इस कानूनी विवाद के चलते FSSAI पर समय का दबाव है और उसे 10 सितंबर, 2026 को होने वाली अगली सुनवाई से पहले एक ठोस निर्णय पेश करना होगा। यदि रेगुलेटर कोर्ट की उम्मीदों के अनुरूप नियम नहीं बनाता है, तो सरकार को सीधे न्यायिक हस्तक्षेप का सामना करना पड़ सकता है।

FMCG सेक्टर पर क्या होगा असर?

यह कानूनी लड़ाई उस समय हो रही है जब FSSAI पहले से ही कंपनियों के भ्रामक विज्ञापनों पर कड़ी नजर रख रही है। '100% नेचुरल' या '0% मैदा' जैसे दावों की जांच के बीच, अब ITC, Nestlé, Dabur, PepsiCo और Coca-Cola जैसी बड़ी कंपनियों के सामने एक नई चुनौती खड़ी हो गई है।

अगर कोर्ट अनिवार्य चेतावनी लेबल लागू करता है, तो कंपनियों को तत्काल ऑपरेशनल कॉस्ट झेलनी पड़ सकती है। इसमें पैकेजिंग को फिर से डिजाइन करना, लेबलिंग टेक्नोलॉजी को अपडेट करना और कुछ मामलों में प्रोडक्ट फॉर्मूलेशन बदलना शामिल है। इसके साथ ही, जिन प्रोडक्ट्स पर स्वास्थ्य चेतावनी दिखेगी, उनकी बिक्री और मार्केट शेयर पर भी नकारात्मक असर पड़ सकता है।

निवेशकों को क्या देखना चाहिए?

निवेशकों के लिए सबसे अहम है पारदर्शिता की तरफ बढ़ता यह कदम। प्रोसेस्ड स्नैक्स, जूस और मीठे ड्रिंक्स बनाने वाली कंपनियों पर इसका सीधा असर पड़ने की आशंका है। हालांकि बड़ी कंपनियों के लिए यह खर्च मैनेज करना संभव हो सकता है, लेकिन ब्रांड री-स्ट्रक्चरिंग और नियम पालन का कुल असर उनके प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव डाल सकता है। 10 सितंबर की सुनवाई के नतीजे से साफ हो जाएगा कि क्या कंपनियों को अब अपनी पैकेजिंग का तरीका पूरी तरह बदलना पड़ेगा या बीच का कोई रास्ता निकलेगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.