होलसेल मार्केट में चीनी के दाम पिछले 2 महीनों में **40%** तक बढ़ गए हैं। बढ़ते इनपुट कॉस्ट के बीच सरकार ने जमाखोरी रोकने के लिए **10 लाख टन** चीनी के ड्यूटी-फ्री इंपोर्ट को मंजूरी दी है और स्टॉक रखने की सीमा **15 दिन** तय कर दी है।
भारतीय FMCG सेक्टर के लिए चीनी की बढ़ती कीमतें एक नई चुनौती बनकर उभरी हैं। खराब मौसम और रेड रॉट जैसी बीमारियों के कारण चीनी का कुल उत्पादन अनुमानित 34.3 मिलियन टन से गिरकर 30.6 मिलियन टन रह गया है। इस सप्लाई संकट ने कच्चे माल की लागत को उस स्तर पर पहुँचा दिया है, जिससे कंपनियों के मुनाफे पर सीधा असर पड़ रहा है।
मुनाफे पर दबाव
जून 2026 की तिमाही में कंपनियों के ऑपरेटिंग मार्जिन 22.2% के चार साल के निचले स्तर पर आ गए थे। बिस्किट, कोल्ड ड्रिंक और चॉकलेट बनाने वाली कंपनियों पर अब सबसे ज्यादा दबाव है, क्योंकि फूड इन्फ्लेशन के इस दौर में इनके लिए कीमतें बढ़ाना और डिमांड को बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है।
सरकार का दखल
कीमतों को कंट्रोल करने के लिए सरकार ने 1 सितंबर, 2026 से सख्त नियम लागू किए हैं। बल्क कंज्यूमर्स अब केवल 15 दिन का स्टॉक रख पाएंगे। साथ ही, घरेलू उपलब्धता बढ़ाने के लिए 10 लाख टन कच्ची चीनी के ड्यूटी-फ्री इंपोर्ट की इजाजत दी गई है।
कंपनियों पर क्या होगा असर?
Britannia Industries जैसी कंपनियां ज्यादा रिस्क में हैं, क्योंकि इनका पोर्टफोलियो मास-मार्केट सेगमेंट पर केंद्रित है। वहीं, Nestlé India और Varun Beverages अपने बेहतर प्रोडक्ट मिक्स और प्राइसिंग पावर के कारण इस स्थिति से निपटने में कुछ बेहतर स्थिति में दिख रही हैं। अब निवेशकों की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि फेस्टिव सीजन के दौरान क्या कंपनियां कीमतें बढ़ाएंगी या ग्रामेज (Grammage) कम करके मार्जिन बचाने की कोशिश करेंगी।
पिछली जून तिमाही में बड़ी पैकेटबंद फूड कंपनियों की सेल्स ग्रोथ गिरकर 5% रह गई है, जो पिछले साल 13% थी। त्योहारों के सीजन में मांग को बरकरार रखना कंपनियों के लिए सबसे बड़ी परीक्षा होगी।
