देश के पटाखा हब Sivakasi में मैन्युफैक्चरर्स मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं। कच्चे माल की कीमतों में **50%** तक का उछाल और बेमौसम बारिश के कारण प्रोडक्शन पर बुरा असर पड़ा है।
भारत के कुल पटाखा उत्पादन का करीब 90% हिस्सा Sivakasi से आता है। इस हब का सालाना टर्नओवर ₹6,000 करोड़ से ₹7,000 करोड़ के बीच है, लेकिन फिलहाल यहां की हजारों छोटी इकाइयां वित्तीय अस्थिरता का सामना कर रही हैं।
कच्चे माल की आसमान छूती कीमतें
इस साल मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट में 30% से 50% तक की बढ़ोतरी हुई है। एल्युमिनियम पाउडर, सल्फर और पोटेशियम नाइट्रेट जैसी जरूरी चीजों के दाम ग्लोबल सप्लाई चेन और फ्रेट खर्चों के चलते बढ़ गए हैं। चूंकि अधिकांश इकाइयां छोटे स्तर पर काम करती हैं और उनके पास सीमित पूंजी है, इसलिए वे इस बढ़ी हुई लागत का बोझ ग्राहकों पर डालने की स्थिति में नहीं हैं।
मौसम और रेगुलेटरी चुनौतियां
सुप्रीम कोर्ट ने 30 सितंबर, 2026 को ग्रीन क्रैकर्स बनाने के लिए अंतरिम आदेश दिया था, जिससे कुछ स्पष्टता तो आई, लेकिन एयर क्वालिटी नॉर्म्स का पालन करना अब भी एक बड़ी चुनौती है। वहीं, अक्टूबर में हुई बेमौसम भारी बारिश ने उत्पादन प्रक्रिया, विशेषकर पटाखे सुखाने के काम को रोक दिया है। इंडस्ट्री डेटा के मुताबिक, इस साल प्रोडक्शन क्षमता में करीब 20% की गिरावट आई है।
लेबर और भविष्य की राह
मजदूरों की कमी ने भी मुश्किलें बढ़ा दी हैं, क्योंकि कई कामगार अधिक स्थिर रोजगार वाले सेक्टरों की ओर रुख कर रहे हैं। अब इंडस्ट्री अपने अस्तित्व को बचाने के लिए सीजनल डिमांड पर निर्भरता कम करना चाहती है। इसके लिए स्पेस और डिफेंस पायरोटेक्निक्स में डायवर्सिफिकेशन पर जोर दिया जा रहा है, ताकि छोटी इकाइयों को आधुनिक टेक्नोलॉजी और बेहतर सेफ्टी स्टैंडर्ड्स मिल सकें।
