Deconstruct Skincare, Go Zero और Newme जैसे नए जमाने के ब्रांड्स AI और क्विक-कॉमर्स की मदद से तेजी से रेवेन्यू बढ़ा रहे हैं। हालांकि, जानकारों ने इनकी बढ़ती निर्भरता को लेकर चेतावनी दी है।
भारत के कंज्यूमर मार्केट में एक नया दौर शुरू हो गया है। पुरानी और धीमी सप्लाई चेन के बजाय, नए जमाने के ब्रांड्स अब AI और क्विक-कॉमर्स (Quick-commerce) का सहारा लेकर कम समय में बड़ा बिजनेस खड़ा कर रहे हैं। हालांकि, यह ग्रोथ जितनी आकर्षक दिख रही है, उसके साथ कुछ गंभीर चुनौतियां भी जुड़ी हैं।
ग्रोथ का नया फॉर्मूला
बेंगलुरु स्थित Deconstruct Skincare ने साइंस-बेस्ड स्किनकेयर के दम पर FY25 में ₹130 करोड़ का रेवेन्यू हासिल किया है। वहीं, आइसक्रीम ब्रांड Go Zero ने क्विक-कॉमर्स इंफ्रास्ट्रक्चर का फायदा उठाते हुए ₹220 करोड़ का एनुअलाइज्ड रेवेन्यू रन रेट दर्ज किया है। फैशन की दुनिया में Newme ने AI का उपयोग करके हर हफ्ते 500 से ज्यादा नए स्टाइल लॉन्च किए हैं, जिससे महज 4 साल में उनका रेवेन्यू ₹240 करोड़ तक पहुंच गया है।
एक ही प्रोडक्ट पर निर्भरता का रिस्क
इन ब्रांड्स की सबसे बड़ी कमजोरी इनका 'हीरो प्रोडक्ट' मॉडल है। Deconstruct Skincare की कुल कमाई का आधा हिस्सा सिर्फ 2 उत्पादों (जेल सनस्क्रीन और विटामिन-सी सीरम) से आता है। जानकारों का कहना है कि अगर मार्केट में कोई बेहतर कॉम्पिटिटर आया या लोगों की पसंद बदली, तो इन कंपनियों के पास ग्रोथ को संभालने के लिए कोई बड़ा बैकअप प्लान नहीं है।
क्विक-कॉमर्स पर हद से ज्यादा निर्भरता
डिस्ट्रीब्यूशन के मामले में भी ब्रांड्स एक ही प्लेटफॉर्म पर निर्भर हैं। उदाहरण के तौर पर, Go Zero अपनी 95% बिक्री Zepto और Blinkit जैसे प्लेटफॉर्म्स के जरिए करता है। यह रणनीति उन्हें तेजी से विस्तार तो दे रही है, लेकिन अगर इन प्लेटफॉर्म्स ने अपने कमीशन बढ़ाए या एल्गोरिदम में बदलाव किया, तो इन ब्रांड्स के मार्जिन पर गहरा असर पड़ सकता है।
कुल मिलाकर, इन स्टार्टअप्स का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वे कितनी जल्दी अपनी प्रोडक्ट रेंज को डायवर्सिफाई करते हैं और डिलीवरी ऐप्स से हटकर खुद का वफादार कस्टमर बेस तैयार करते हैं।
