Supreme Court ने केंद्र सरकार और FSSAI को निर्देश दिया है कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स के पैकेट पर अनिवार्य वार्निंग लेबलिंग नीति को **2 हफ्ते** के भीतर अंतिम रूप दिया जाए। इस फैसले से FMCG कंपनियों की रेगुलेटरी टेंशन बढ़ गई है।
रेगुलेशन का दबाव और कोर्ट का रुख
सुप्रीम कोर्ट ने पैकेज्ड फूड इंडस्ट्री में ट्रांसपेरेंसी को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने स्पष्ट कर दिया है कि जन स्वास्थ्य (Public Health) को इंडस्ट्री की सुविधा से ऊपर रखा जाएगा। कोर्ट ने उन सरकारी दलीलों को भी खारिज कर दिया है, जिनमें कहा गया था कि भारत अभी वैश्विक लेबलिंग मानकों के लिए तैयार नहीं है।
FMCG सेक्टर पर पड़ेगा सीधा असर
निवेशकों के लिए यह एक बड़ी रेगुलेटरी अनिश्चितता है। देश की दिग्गज एफएमसीजी (FMCG) कंपनियां, जो स्नैक्स, बिस्कुट और कोल्ड ड्रिंक्स जैसे उत्पादों पर निर्भर हैं, उन्हें अब अपनी पैकेजिंग और लेबलिंग स्ट्रैटेजी को पूरी तरह से बदलना पड़ सकता है। यदि सरकार कड़े वार्निंग सिंबल अनिवार्य करती है, तो कंपनियों के लिए Compliance Cost बढ़ना तय है।
इसके अलावा, उपभोक्ता व्यवहार (Consumer Behavior) पर पड़ने वाले असर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अंतरराष्ट्रीय अनुभव बताते हैं कि स्पष्ट वार्निंग से हेल्थ-कॉन्शियस ग्राहक इन प्रोडक्ट्स से दूरी बना सकते हैं, जिससे भविष्य में सेल्स वॉल्यूम पर दबाव आ सकता है।
मार्केट का बैकग्राउंड
यह मामला '3S एंड आवर हेल्थ सोसाइटी' द्वारा दायर एक जनहित याचिका से जुड़ा है। गौरतलब है कि भारत में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड मार्केट 2009 से 2023 के बीच 150% से ज्यादा बढ़ चुका है। पहले FSSAI ने वार्निंग सिंबल के बजाय केवल उपभोग सीमा बताने का प्रस्ताव रखा था, जिसे अब कोर्ट ने किनारे कर दिया है।
आगे क्या देखें?
अगले 2 हफ्ते काफी महत्वपूर्ण हैं। निवेशकों को सरकार द्वारा जारी होने वाली फाइनल पॉलिसी का इंतजार करना चाहिए। यह देखना दिलचस्प होगा कि वार्निंग लेबल कितने कड़े होते हैं। साथ ही, कंपनियों की अगली अर्निंग्स कॉल (Earnings Call) पर नजर रखें, जहां मैनेजमेंट अपने पोर्टफोलियो में बदलाव के संकेत दे सकता है।
