भारत की जानी-मानी क्विक कॉमर्स (Quick Commerce) कंपनियां, जैसे Blinkit, Zepto, और Swiggy Instamart, अब अपने बिजनेस मॉडल में बड़ा बदलाव कर रही हैं। वे अब रोजमर्रा की ज़रूरतों के सामानों के बजाय महंगे और प्रीमियम ग्रॉसरी प्रोडक्ट्स, जैसे आर्टीज़नल चीज़ (artisanal cheese) और इंपोर्टेड (imported) सामानों पर ज़्यादा ध्यान दे रही हैं। इस कदम का मकसद कम मार्जिन (low-margin) वाली रोज़मर्रा की चीज़ों से हटकर ज़्यादा मुनाफा कमाना है।
मार्जिन बढ़ाने की नई स्ट्रेटेजी
लगातार मुनाफे (profitability) के दबाव के चलते ये कंपनियां अब हाई-वैल्यू (high-value) गॉरमेट प्रोडक्ट्स की ओर बढ़ रही हैं। आमतौर पर इन प्लेटफॉर्म्स पर एक सामान्य ग्रोसरी ऑर्डर (grocery order) का औसत ₹500 से ₹620 रहता है। लेकिन, प्रीमियम गॉरमेट बास्केट (gourmet baskets) का लक्ष्य ₹1,000 से ₹1,500 प्रति ऑर्डर रखा गया है।
खास बात यह है कि ये कंपनियां इन प्रीमियम कैटेगरी के लिए अपने स्टॉक (inventory) को खुद मैनेज करती हैं, जिससे उन्हें कमीशन के बजाय पूरा मुनाफा मिलता है। यह कदम इसलिए भी अहम है क्योंकि कुछ प्लेटफॉर्म्स पिछले कुछ क्वार्टरों में अपने एडजस्टेड EBITDA मार्जिन टारगेट (adjusted EBITDA margin targets) 5% से 6% तक पहुंचने में संघर्ष कर रहे थे।
छोटे स्पेशलिस्ट्स के लिए चुनौती?
बड़ी और फंडेड क्विक कॉमर्स कंपनियों का प्रीमियम फूड स्पेस में आना, FirstClub और Handpickd जैसे छोटे स्पेशलिस्ट (specialized) रिटेलर्स के लिए सीधी चुनौती है। हालांकि, ये स्पेशलिस्ट रिटेलर्स अपनी हाई कस्टमर लॉयल्टी (customer loyalty) (लगभग 70% रिटेंशन रेट) बनाए रखते हैं, लेकिन वे एक खास निश मार्केट (niche market) में काम करते हैं। क्या आम ऐप यूज़र्स प्रीमियम लग्ज़री आइटम्स के लिए इन बड़ी कंपनियों को चुनेंगे, यह देखना बाकी है।
निवेशकों को क्या देखना है?
हाई-वैल्यू प्रोडक्ट्स की ओर बढ़ने से भले ही प्रति यूनिट इकोनॉमिक्स (unit economics) में सुधार हो, लेकिन निवेशकों को कुछ बातों पर नज़र रखनी होगी। प्रीमियम ग्रॉसरी आइटम्स का एड्रेसेबल मार्केट (addressable market) रोज़मर्रा की ज़रूरतों वाले मार्केट से काफी छोटा है, जिसका मतलब है कि यह रणनीति वॉल्यूम ग्रोथ (volume growth) में ज़्यादा बड़ा योगदान नहीं दे सकती।
साथ ही, इन गॉरमेट और पेरिशेबल (perishable) सामानों की सप्लाई चेन (supply chain) को मैनेज करना भी एक चुनौती है, क्योंकि इनकी शेल्फ लाइफ (shelf life) कम होती है और पैकेज्ड एसेंशियल्स (packaged essentials) की तुलना में इन्हें हैंडल करना ज़्यादा मुश्किल होता है। Flipkart Minutes के भी इस स्पेस में आने की खबरें हैं, जिससे प्रीमियम सेगमेंट में कॉम्पिटिशन (competition) बढ़ेगा और ग्राहक अधिग्रहण लागत (customer acquisition costs) पर असर पड़ सकता है। निवेशकों को तिमाही नतीजों पर नज़र रखनी चाहिए कि क्या एवरेज ऑर्डर वैल्यू (average order value) बढ़ रही है और क्या इन नई कैटेगरीज़ से कंपनी के बॉटम लाइन (bottom line) में सुधार हो रहा है।
