Quick Commerce Platforms की मनमानी! FMCG Brands से मार्केटिंग के लिए ज़्यादा Fees वसूल रहे

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
Quick Commerce Platforms की मनमानी! FMCG Brands से मार्केटिंग के लिए ज़्यादा Fees वसूल रहे

Quick commerce platforms अब FMCG Brands पर ज़्यादा मार्जिन और मार्केटिंग खर्च बढ़ाने का दबाव बना रहे हैं। यह बदलाव तेजी से डिलीवरी वाले चैनलों के बढ़ते दबदबे को दर्शाता है, जो निर्माताओं को विजिबिलिटी की लागत और मुनाफे के बीच संतुलन बनाने के लिए मजबूर कर रहा है।

Detailed Coverage

Quick Commerce Platforms का बढ़ता दबदबा: FMCG Brands पर ज़्यादा मार्जिन और मार्केटिंग खर्च का दबाव

Quick commerce प्लेटफॉर्म अपनी रिटेल ताकत का इस्तेमाल कंज्यूमर गुड्स कंपनियों से ज़्यादा मार्केटिंग निवेश और बेहतर मार्जिन वसूलने के लिए कर रहे हैं। जैसे-जैसे ये डिलीवरी प्लेटफॉर्म fast-moving consumer goods (FMCG) की बिक्री में बड़ा हिस्सा हासिल कर रहे हैं, वे अब सीधे पार्टनरशिप से हटकर आक्रामक तरीके से कमाई करने के मॉडल की ओर बढ़ गए हैं। Brands की रिपोर्ट के अनुसार, इन प्लेटफॉर्म्स पर मार्केटिंग का खर्च सालाना लगभग 20% बढ़ गया है, और कुछ पीक समय में तो यह 40% तक बढ़ा है।

नीलामी-शैली की बोली और बढ़ती लागत

इस बदलाव का मुख्य कारण प्रोडक्ट की प्राइम प्लेसमेंट और कीवर्ड सर्च विजिबिलिटी के लिए नीलामी-शैली की बोली (auction-style bidding) का लागू होना है। प्लेटफॉर्म अब फिक्स्ड-रेट मार्केटिंग स्लॉट नहीं दे रहे हैं; इसके बजाय, वे Brands को कैटेगरी लिस्टिंग और सर्च रिजल्ट्स में टॉप पोजीशन के लिए एक-दूसरे के खिलाफ बोली लगाने के लिए आमंत्रित कर रहे हैं। यह प्रैक्टिस सरोगेट एडवरटाइजिंग (surrogate advertising) तक भी फैल गई है, जहाँ एक ब्रांड की तलाश करने वाले ग्राहक को प्रतिद्वंद्वी उत्पाद प्रमुखता से दिखाए जा सकते हैं। Parle Products और Adani Wilmar जैसी कंपनियों के उद्योग अधिकारियों ने नोट किया है कि बातचीत की शक्ति अब प्लेटफॉर्म्स की ओर शिफ्ट हो गई है, जो कि बड़े मॉडर्न रिटेल चेन द्वारा कभी विशेष रूप से इस्तेमाल किए जाने वाले लीवरेज जैसा है।

कई निर्माताओं के लिए, Quick commerce अब उनके कुल ऑनलाइन ग्रोसरी सेल्स का 75% तक है। नतीजतन, कंपनियां अपनी मार्केट पोजीशन बनाए रखने के लिए इन शर्तों को स्वीकार करने के दबाव में हैं। नई प्रोडक्ट लॉन्च और प्रीमियम कैटेगरी के लिए विजिबिलिटी सुरक्षित करने की तात्कालिकता विशेष रूप से अधिक है, जो Quick-delivery एनवायरनमेंट में फलते-फूलते हैं। हालाँकि कुछ निर्माता इन यूजर्स के लिए प्लेटफॉर्म-विशिष्ट पैकेजिंग और उत्पाद विकसित कर रहे हैं, इन ऐप्स पर अधिग्रहण की बढ़ती लागत धीरे-धीरे समग्र मार्जिन पर भारी पड़ने लगी है।

रिटेल बातचीत में रणनीतिक बदलाव

बड़े खिलाड़ी अपने समग्र पैमाने का लाभ उठाकर इन दबावों का मुकाबला करने की कोशिश कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, Reliance Retail अपने फिजिकल स्टोर नेटवर्क और अपने Quick commerce आर्म, JioMart को समेकित व्यापार शर्तों पर बातचीत करने के लिए एक एकीकृत मोर्चे के रूप में प्रस्तुत करना शुरू कर दिया है। अपने ओमनीचैनल उपस्थिति को एकीकृत करके, बड़े खुदरा विक्रेता स्वतंत्र प्लेटफार्मों की तुलना में बेहतर मार्जिन हासिल करने का लक्ष्य रखते हैं। हालाँकि, छोटे और मध्यम आकार के ब्रांडों को इन बढ़े हुए मार्केटिंग खर्चों को अवशोषित करने में अधिक कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है, जो सीधे उनके बॉटम लाइन को प्रभावित करता है।

निवेशकों को इस बात पर नज़र रखनी चाहिए कि FMCG कंपनियां इन बढ़ती चैनल लागतों का प्रबंधन कैसे करती हैं। Brands की लॉन्ग-टर्म प्रॉफिटेबिलिटी इस बात पर निर्भर करेगी कि वे इन खर्चों को उपभोक्ताओं पर डालने में सक्षम हैं या मार्केट शेयर खोए बिना अपने मार्केटिंग खर्च को ऑप्टिमाइज़ करते हैं। इसके अतिरिक्त, रेगुलेटरी एनवायरनमेंट एक महत्वपूर्ण कारक बना हुआ है; डिजिटल कीवर्ड एडवरटाइजिंग में ट्रेडमार्क के उपयोग से संबंधित कानूनी मिसालें अंततः इन प्लेटफार्मों द्वारा अपनी नीलामी-आधारित सर्च प्लेसमेंट कैसे आयोजित की जाती हैं, इसे प्रभावित कर सकती हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.