Navratri के दौरान Swiggy और Zepto जैसे क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स पर ऑर्डर्स की बाढ़ आ गई है। अब ग्रोसरी के अलावा कपड़े और ज्वेलरी की बिक्री में भी उछाल देखा गया है, लेकिन निवेशकों के मन में बड़ा सवाल यही है कि क्या यह उछाल कंपनी के ऑपरेशनल कॉस्ट को कवर कर उन्हें प्रॉफिटेबल बना पाएगा?
हालिया नवरात्रि सीजन ने यह साफ कर दिया है कि कंज्यूमर हैबिट्स तेजी से बदल रही हैं। लोग अब आखिरी मिनट की फेस्टिव जरूरतों के लिए क्विक कॉमर्स पर पूरी तरह निर्भर हो गए हैं। Swiggy ने 17 अक्टूबर से 20 अक्टूबर के बीच मिठाइयों के ऑर्डर में 36.4% की साल-दर-साल बढ़ोतरी दर्ज की है। वहीं, Zepto पर फेस्टिव कपड़ों की बिक्री 400% तक उछल गई, जबकि ज्वेलरी की मांग में भी भारी इजाफा देखा गया। ये आंकड़े दिखाते हैं कि कंपनियां अब नॉन-पेरिशेबल गुड्स के जरिए अपनी कमाई बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं।
ग्रोसरी से आगे बढ़कर मार्जिन सुधारने की कोशिश
निवेशकों के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि ये कंपनियां अब ग्रोसरी और खाने-पीने के सामान (जिनमें मार्जिन बहुत कम होता है) से हटकर अन्य कैटेगरी पर ध्यान दे रही हैं। कपड़े, ज्वेलरी और वेलनेस जैसे हाई-वैल्यू आइटम बेचने से कंपनी का एवरेज ऑर्डर वैल्यू बढ़ता है, जिससे यूनिट इकोनॉमिक्स में सुधार की उम्मीद है। हालांकि, इन नई कैटेगरी के लिए इन्वेंट्री और लॉजिस्टिक्स संभालना एक बड़ी चुनौती है।
ऑपरेशन्स और रेगुलेटरी रिस्क पर नजर
त्योहारी सीजन की यह भारी मांग कंपनी के डार्क स्टोर्स और डिलीवरी फ्लीट की परीक्षा ले रही है। अगर डिलीवरी में देरी होती है या स्टॉक खत्म होता है, तो ब्रांड की साख पर बुरा असर पड़ सकता है। साथ ही, लेबर प्रैक्टिसेज और आवासीय इलाकों में डार्क स्टोर्स को लेकर आने वाले सरकारी नियमों पर भी निवेशकों को पैनी नजर रखनी होगी।
क्या है कंपटीशन का हाल?
यह ट्रेंड सिर्फ Swiggy या Zepto तक सीमित नहीं है, Zomato का Blinkit भी इस रेस में पूरी ताकत से उतरा है। अब असली मुकाबला इस बात का है कि कौन सी कंपनी बिना ज्यादा कैश बर्न किए अपनी इन्वेंट्री मैनेज करती है। तिमाही नतीजों में यह देखना होगा कि यह फेस्टिव उछाल केवल सेल वॉल्यूम बढ़ा रहा है या कंपनी के बॉटम लाइन पर भी सकारात्मक असर डाल रहा है।
