फेस्टिव सीजन में Quick commerce कंपनियां अब ग्रोसरी से आगे बढ़कर इलेक्ट्रॉनिक्स और फैशन जैसे महंगे सामान भी बेच रही हैं। सीधे इन्वेंट्री (Inventory) रखने के इस नए मॉडल से कंपनी का रेवेन्यू तो बढ़ सकता है, लेकिन निवेशकों के लिए रिस्क और मार्जिन पर दबाव बढ़ा है।
भारत में फेस्टिव शॉपिंग का तरीका अब पूरी तरह बदल रहा है। Quick commerce कंपनियां अब केवल डेली जरूरत के सामान तक सीमित नहीं हैं, बल्कि रेवेन्यू बढ़ाने के लिए फैशन, ब्यूटी और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे महंगे सेगमेंट में आक्रामक तरीके से घुस रही हैं।
इन्वेंट्री-लेड मॉडल का गणित
ज्यादातर कंपनियां अब बिचौलिया बनने के बजाय सीधे इन्वेंट्री खरीदने और स्टॉक करने के मॉडल पर स्विच कर रही हैं। निवेशकों के लिए यह समझना जरूरी है कि इससे कंपनी के रेवेन्यू फिगर में तो उछाल दिखेगा, लेकिन कंपनी का खर्च—वेयरहाउसिंग, लॉजिस्टिक्स और स्टॉक मैनेजमेंट—भी भारी बढ़ जाएगा। अगर सामान की बिक्री उम्मीद के मुताबिक नहीं हुई, तो कैश फ्लो पर बड़ा दबाव आ सकता है।
AI से बढ़ेगी प्रोडक्टिविटी
कंपनियां इस बदलाव में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का पूरा इस्तेमाल कर रही हैं। डिमांड फोरकास्टिंग के जरिए यह पता लगाया जा रहा है कि किस इलाके में किस आइटम की मांग है। अनुमान है कि 2030 तक AI के जरिए रिटेल प्रोडक्टिविटी 35% से 37% तक बढ़ सकती है।
चुनौतियां और रिस्क
ई-कॉमर्स मार्केट भले ही 2030 तक $345 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान हो, लेकिन फिलहाल ग्राहक काफी सतर्क हैं। महंगाई और ग्रामीण आय में सुस्ती के कारण लोग इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे महंगे सामान खरीदते समय सोच-समझकर खर्च कर रहे हैं। ऐसे में कंपनियों को डिस्काउंट और मुनाफे के बीच संतुलन बनाना बड़ी चुनौती होगी।
अलग-अलग कंपनियों की रणनीति
मार्केट के बड़े प्लेयर्स की रणनीति भी अलग है। Amazon India और Meesho फेस्टिव सीजन के लिए बड़े पैमाने पर सीजनल हायरिंग कर रहे हैं, वहीं Zepto अपनी सर्विस क्वालिटी बनाए रखने के लिए स्थायी वर्कफोर्स पर जोर दे रहा है। देखना यह होगा कि क्या यह नया मॉडल टिकाऊ मुनाफा दे पाएगा या भारी डिस्काउंट और तेज डिलीवरी की होड़ में मार्जिन दबकर रह जाएगा?
