KFC, McDonald's और Domino's जैसे बड़े फूड आउटलेट्स अब ग्राहकों को वापस स्टोर तक खींचने के लिए **₹99** की स्ट्रेटेजी अपना रहे हैं। हालांकि इससे फुटफॉल (footfall) तो बढ़ रहा है, लेकिन औसत बिल घटने से कंपनियों के मार्जिन पर दबाव का जोखिम बना हुआ है।
भारत के फास्ट-फूड सेक्टर में अब एक बड़ा बदलाव दिख रहा है। महंगाई के कारण बाहर खाना कम होने से KFC, McDonald’s और Burger King जैसी कंपनियां अब ग्राहकों को लुभाने के लिए ₹99 के प्राइस पॉइंट पर दांव लगा रही हैं। इनका मकसद एक साइकोलॉजिकल बैरियर तोड़कर ग्राहकों को वापस स्टोर तक लाना है, ताकि वे केवल सस्ते मील तक सीमित न रहें।
नतीजों पर असर (Performance Impact)
यह स्ट्रेटेजी काम करती दिख रही है। Sapphire Foods (KFC ऑपरेटर) की बिक्री में मौजूदा स्टोर्स से 5% की ग्रोथ देखी गई है, जिसका श्रेय वैल्यू-कैंपेन को जाता है। वहीं, Westlife Foodworld (McDonald’s ऑपरेटर) ने मौजूदा आउटलेट्स से 4.3% की सेल्स ग्रोथ दर्ज की है। दोनों कंपनियों के लिए सबसे बड़ा फायदा स्टोर पर आने वाले ग्राहकों की संख्या में दो अंकों (Double-digit) की बढ़ोतरी है।
अलग राह पर Jubilant FoodWorks
Domino's चलाने वाली Jubilant FoodWorks की कहानी थोड़ी अलग है। कंपनी ने डिलीवरी रेवेन्यू में 12.1% की ग्रोथ दिखाई है। पहले कंपनी आक्रामक प्राइसिंग से बचती थी ताकि मार्जिन न गिरे, लेकिन अब वह ऑनलाइन की जगह स्टोर-एक्सक्लूसिव वैल्यू मेन्यू पर जोर दे रही है। इसी बीच, बाजार में नए प्रयोग भी हो रहे हैं, जैसे Zomato का कॉरपोरेट ऑफिस में वेंडिंग मशीन का पायलट प्रोजेक्ट।
मार्जिन का रिस्क (The Profitability Challenge)
सबसे बड़ी चुनौती मुनाफे यानी मार्जिन की है। जब सामान सस्ता बिकता है, तो प्रति ग्राहक बिल (Average bill) कम हो जाता है। अगर ग्राहकों की संख्या बिल में आई कमी की भरपाई नहीं कर पाई, तो प्रॉफिट पर दबाव आ सकता है। इसे काउंटर करने के लिए ये कंपनियां कॉफी, बेवरेजेज और डेजर्ट जैसे हाई-मार्जिन आइटम्स पर जोर दे रही हैं ताकि बिल का साइज बढ़ सके।
आने वाले क्वार्टरली रिजल्ट्स में निवेशकों की नजर इस बात पर होगी कि क्या यह ट्रैफिक-लेड रिकवरी वाकई प्रॉफिटेबल है या सिर्फ एक अस्थायी बढ़त है।
