CSIR-IHBT और GFI India की एक नई रिसर्च ने सबको चौंका दिया है। स्टडी के मुताबिक, कुछ प्लांट-बेस्ड मीट प्रोडक्ट्स में चिकन के मुकाबले प्रोटीन का अब्जॉर्प्शन (Absorption) काफी ज्यादा होता है। यह खबर भारतीय FMCG कंपनियों के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकती है, जो अब स्थानीय अनाज जैसे बाजरा और दालों पर अपना फोकस शिफ्ट कर सकती हैं।
न्यूट्रिशन का नया पैमाना
अब तक भारतीय फूड इंडस्ट्री केवल लेबल पर लिखे कुल प्रोटीन के आंकड़ों पर निर्भर थी, लेकिन CSIR-IHBT और GFI India की हालिया रिसर्च ने इस दावे को चुनौती दी है। लैबोरेटरी सिमुलेशन में किए गए परीक्षणों में पाया गया कि प्लांट-बेस्ड कबाब और पैटीज़ का बायो-अवेलेबिलिटी स्कोर 58% से 86% के बीच रहा। वहीं, दूसरी ओर पारंपरिक चिकन का स्कोर मात्र 21% से 43% ही दर्ज किया गया। इसका सीधा मतलब है कि लेबल पर दिखने वाले प्रोटीन से कहीं ज्यादा जरूरी है कि शरीर उसे कितनी कुशलता से सोख रहा है।
स्थानीय फसलों की तरफ झुकाव
भारत में दालों और बाजरे का उत्पादन भरपूर होता है, फिर भी कंपनियां अब तक महंगे इम्पोर्टेड प्रोटीन कंसंट्रेट्स पर निर्भर थीं। रिसर्च से पता चला है कि प्रेशर कुकिंग, स्प्राउटिंग और फर्मेंटेशन जैसी पारंपरिक विधियों से स्थानीय फसलों के प्रोटीन को आसानी से बेहतर बनाया जा सकता है। ITC Ltd जैसी बड़ी FMCG दिग्गज कंपनियां पहले से ही हेल्थ और न्यूट्रिशन के इस नए कॉम्बिनेशन को तलाश रही हैं। अगर कंपनियां स्थानीय रॉ मटेरियल का इस्तेमाल बढ़ाती हैं, तो न केवल लागत कम होगी, बल्कि सप्लाई चेन भी और मजबूत होगी।
निवेशकों के लिए चेतावनी (Investor Monitorable)
हालांकि ये नतीजे उत्साहजनक हैं, लेकिन निवेशकों को बाजार की जमीनी हकीकत समझनी होगी। भारत में प्लांट-बेस्ड मीट अभी भी अपनी शुरुआती स्टेज में है। स्वाद की प्राथमिकता, कीमत का अधिक होना और पारंपरिक खान-पान की आदतें अभी भी मुख्य चुनौतियां हैं। भविष्य में उन्हीं कंपनियों को फायदा होगा जो वैज्ञानिक दावों और आम ग्राहकों की पसंद के बीच सही संतुलन बना पाएंगी और किफायती कीमतों पर बेहतर स्वाद पेश करेंगी।
