PepsiCo और Monster Beverage ने FSSAI के उस आदेश को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी है, जिसमें 'Energy Drink' लेबल के इस्तेमाल पर रोक लगाई गई है। इस कानूनी जंग के चलते निवेशकों की नजरें कंपनी के इन्वेंट्री लॉस और ऑपरेशनल खर्चों पर टिकी हैं।
रेगुलेटरी विवाद और कानूनी जंग
मामले की शुरुआत 30 जून, 2026 को हुई थी, जब फूड रेगुलेटर FSSAI ने एक आदेश जारी कर कंपनियों को अपने हाई-कैफीन प्रोडक्ट्स पर 'Energy Drink' शब्द का लेबल इस्तेमाल करने से रोक दिया था। रेगुलेटर का तर्क है कि भारत में 'Energy Drink' कोई मान्यता प्राप्त कैटेगरी नहीं है और ऐसे लेबल कंज्यूमर्स को कैफीन, शुगर और टॉरिन (taurine) की मात्रा से जुड़े रिस्क के प्रति गुमराह कर सकते हैं।
इन्वेंट्री और भारी नुकसान का रिस्क
कंपनियों का कहना है कि नियमों को लागू करने के लिए महज 90 दिनों का समय दिया गया था, जो काफी कम है। PepsiCo के लिए यह स्थिति बेहद चिंताजनक है, क्योंकि 31 जुलाई, 2026 तक कंपनी के पास करीब 49.2 करोड़ बोतलें और 2.6 करोड़ केन सर्कुलेशन में थे। अगर लेबलिंग बदलनी पड़ती है, तो कंपनी को भारी इन्वेंट्री राइट-ऑफ (inventory write-offs) झेलना पड़ सकता है। भारतीय एनर्जी ड्रिंक मार्केट 2028 तक $1.6 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है, ऐसे में यह विवाद कंपनियों की ग्रोथ को प्रभावित कर सकता है।
कोर्ट का रुख और भविष्य की चुनौतियां
इससे पहले रेड बुल (Red Bull) के मामले में भी दिल्ली हाई कोर्ट ने FSSAI के आदेश को इसलिए रद्द कर दिया था क्योंकि कंपनी को अपना पक्ष रखने का मौका नहीं दिया गया था। कोर्ट ने हालांकि रेगुलेटर को प्रोटोकॉल का पालन करते हुए नए सिरे से कार्रवाई करने की छूट दी थी। हेल्स एनर्जी (Hell Energy) जैसे ब्रांड्स को भी अलग-अलग अदालतों से राहत मिली है।
निवेशकों के लिए क्या है महत्वपूर्ण?
निवेशकों को अब यह देखना होगा कि क्या कंपनियां ब्रांड री-नेमिंग या री-पैकेजिंग की ओर बढ़ती हैं। अगर ऐसा होता है, तो मार्केटिंग खर्च बढ़ सकता है और प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव दिख सकता है। कोर्ट के आने वाले फैसलों पर सबकी नजरें होंगी कि क्या FSSAI को लेबलिंग मानकों को लेकर कोई नया और कानूनी रूप से मजबूत आदेश जारी करने की अनुमति मिलती है या नहीं।
