भारतीय खाने की जानी-मानी कंपनियां MTR Foods और iD Fresh Food अब अपने पारंपरिक नाश्ते के उत्पादों में प्रोटीन की मात्रा बढ़ा रही हैं। इस कदम से वे पश्चिमी देशों के हेल्दी सीरियल्स और नाश्ते के विकल्पों से मुकाबला करना चाहती हैं। विश्लेषकों का मानना है कि इससे हेल्थ-कॉन्शियस ग्राहकों को लुभाया जा सकेगा, साथ ही कंपनियों को प्रीमियम प्राइसिंग के जरिए अपना मुनाफा (Profit Margin) भी बढ़ाने का मौका मिलेगा।
Detailed Coverage
नाश्ते के बाजार में आया बड़ा बदलाव
भारतीय नाश्ते के बाजार में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। MTR Foods (Orkla India का हिस्सा) और बेंगलुरु की iD Fresh Food जैसी बड़ी पैक्ड फूड कंपनियां अपने रोज़मर्रा के खाने जैसे इडली, डोसा, उपमा और पोहा को प्रोटीन से भरपूर बना रही हैं। इसका मकसद ओट्स, म्यूसली और ग्रीक योगर्ट जैसे पश्चिमी देशों के हेल्थ-फोकस्ड विकल्पों को कड़ी टक्कर देना है।
प्रीमियम ग्राहकों को टारगेट
MTR Foods ने एक ऐसी ब्रेकफास्ट रेंज पेश की है, जिसमें उनके पारंपरिक मिक्स में 10 ग्राम प्रोटीन शामिल है। कंपनी इन प्रोडक्ट्स को 28 शहरों में क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म के जरिए पहुंचा रही है। वहीं, iD Fresh Food ने भी प्रोटीन-फोर्टिफाइड इडली और डोसा बैटर के साथ-साथ पराठे भी लॉन्च किए हैं, जिनके बारे में कंपनी का दावा है कि इनमें 24 ग्राम तक प्रोटीन होता है।
यह बदलाव ग्राहकों की बदलती आदतों का नतीजा है। लोग अब ऐसे प्रोडक्ट्स चाहते हैं जिनमें सेहतमंद फायदे हों, लेकिन पारंपरिक स्वाद से समझौता न हो। Worldpanel के आंकड़ों के मुताबिक, रेडी-टू-कुक (RTC) सेगमेंट में पिछले दो सालों में जबरदस्त उछाल आया है। इसका वॉल्यूम दोगुना हो गया है और इसने करीब 18 मिलियन नए ग्राहकों को आकर्षित किया है।
इनोवेशन से मुनाफे में बढ़ोतरी
बाजार हिस्सेदारी के अलावा, प्रोटीन-युक्त उत्पादों की ओर बढ़ने का मुख्य कारण ज्यादा मुनाफा कमाने की संभावना है। Kearney की एक रिपोर्ट के अनुसार, फोर्टिफाइड प्रोडक्ट्स पर आम तौर पर प्रीमियम कीमत मिलती है, जिससे ग्रॉस मार्जिन 10 बेसिस पॉइंट तक बढ़ सकता है। इन एडिटिव्स को मिलाने की मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट कम होती है, जबकि प्रोडक्ट की कीमत ज्यादा रखी जा सकती है।
उदाहरण के लिए, iD Fresh Food का रेगुलर इडली-डोसा बैटर 500 ग्राम के पैक के लिए करीब ₹72 में बिकता है, जबकि प्रोटीन-फोर्टिफाइड वर्जन की कीमत ₹93 है। इस प्राइसिंग स्ट्रैटेजी से ब्रांड्स खुद को प्रीमियम 'बेटर-फॉर-हेल्थ' कैटेगरी में स्थापित कर पा रहे हैं। विश्लेषकों का अनुमान है कि 2030 तक यह मार्केट ₹2.5 लाख करोड़ का हो जाएगा।
आगे क्या?
प्रोटीन-युक्त स्नैक्स पर फोकस बढ़ रहा है, लेकिन इन ब्रांड्स की मार्केट में अपनी पकड़ बनाए रखने की क्षमता ग्राहकों द्वारा इन्हें अपनाने और वितरण (Distribution) को बढ़ाने पर निर्भर करेगी। पश्चिमी हेल्थ-फोकस्ड ब्रेकफास्ट कैटेगरी ने पिछले दो सालों में अपना वॉल्यूम 1.5 गुना बढ़ाया है, इसलिए मुकाबला कड़ा रहने वाला है। निवेशक इस बात पर नज़र रखेंगे कि क्या यह ट्रेंड ज्यादा से ज्यादा ग्राहकों को महंगे, वैल्यू-एडेड प्रोडक्ट्स की ओर मोड़ पाता है और आने वाले समय में यह बढ़ती प्रतिस्पर्धा इन कंपनियों की कीमत तय करने की ताकत को कैसे प्रभावित करती है।
