प्राइवेट इक्विटी फर्म Multiples, जूलरी स्टार्टअप Giva में ₹80-100 मिलियन (लगभग ₹665-830 करोड़) के निवेश के लिए डील फाइनल करने के करीब है। इस डील में कंपनी का वैल्यूएशन ₹6,000 करोड़ के पार जाने की उम्मीद है। ये फंड रिटेल विस्तार और लैब-ग्रोन डायमंड मैन्युफैक्चरिंग में मदद करेंगे।
Giva का मूल्यांकन ₹6,000 करोड़ के पार?
प्राइवेट इक्विटी फर्म Multiples, बेंगलुरु स्थित जूलरी स्टार्टअप Giva में एक बड़ी हिस्सेदारी खरीदने के लिए अंतिम दौर की बातचीत में है। उम्मीद है कि यह डील $80 मिलियन से $100 मिलियन (लगभग ₹665 करोड़ से ₹830 करोड़) के बीच होगी। इस निवेश के साथ Giva का मूल्यांकन लगभग ₹6,000 करोड़ तक पहुंच सकता है। यह फंड कंपनी के देश भर में विस्तार में मदद करेगा, जिसने पहले भी कई फंडिंग राउंड्स के जरिए अपनी पैठ बढ़ाई है।
रिटेल विस्तार और डायमंड मैन्युफैक्चरिंग पर फोकस
इस पूंजी निवेश का मुख्य उद्देश्य Giva की ग्रोथ स्ट्रेटेजी को सपोर्ट करना है। इसमें नए रिटेल स्टोर्स खोलना और इन्वेंटरी बढ़ाना शामिल है। खास तौर पर, लैब-ग्रोन डायमंड्स (Lab-Grown Diamonds) के मैन्युफैक्चरिंग क्षमताओं को बढ़ाने पर जोर दिया जाएगा, क्योंकि कंपनी इस सेगमेंट में अपनी मार्केट हिस्सेदारी बढ़ाना चाहती है।
मुनाफे से ज्यादा विस्तार पर जोर?
जहां कंपनी ने तेजी से टॉप-लाइन ग्रोथ दिखाई है, वहीं इसके खर्च भी बढ़े हैं। फाइनेंशियल ईयर 2025 (FY25) में कंपनी का रेवेन्यू ₹518 करोड़ रहा, जो पिछले साल के मुकाबले 89% ज्यादा है। हालांकि, इसी अवधि में कंपनी का घाटा 22% बढ़ गया। इससे यह साफ है कि Giva फिलहाल तत्काल मुनाफे के बजाय आक्रामक विस्तार और कस्टमर एक्विजिशन पर ध्यान केंद्रित कर रही है।
कॉम्पिटिशन और मार्जिन पर दबाव
कंपनी का लैब-ग्रोन डायमंड्स पर फोकस कंज्यूमर प्रेफरेंस में आ रहे बदलाव के अनुरूप है। लेकिन, इस सेगमेंट में कीमतों में उतार-चढ़ाव का जोखिम बना रहता है। सप्लाई बढ़ने से होलसेल कीमतों पर दबाव आया है, जो आने वाले वर्षों में रिटेलर्स के प्रॉफिट मार्जिन को प्रभावित कर सकता है।
Giva को CaratLane, Bluestone, और Melorra जैसे स्थापित डायरेक्ट-टू-कंज्यूमर (DTC) जूलरी ब्रांड्स से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। ये सभी ऑर्गेनाइज्ड जूलरी सेक्टर में, खासकर टियर-II शहरों में अपनी पैठ मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं, जहां Giva भी विस्तार कर रही है।
आगे चलकर, कंपनी के लिए सबसे बड़ी चुनौती ऑपरेशनल एफिशिएंसी (Operational Efficiency) में सुधार लाना और बढ़ते घाटे को नियंत्रित करना होगा। निवेशकों की नजरें इस बात पर रहेंगी कि क्या नया निवेश कंपनी को प्रॉफिटेबिलिटी के रास्ते पर ले जाता है, या कॉम्पिटिशन के चलते लगातार हाई स्पेंडिंग (High Spending) से मार्जिन पर दबाव बना रहता है।
