कचरे से निपटने की नई पहल
Mother Dairy, जिसका सालाना टर्नओवर ₹20,300 करोड़ है, पर्यावरण को लेकर बढ़ रही चिंताओं के बीच यह पहल कर रही है। खास बात यह है कि कंपनी बिना उपभोक्ताओं की जेब पर बोझ डाले यह बदलाव ला रही है। नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड (NDDB) की सहायक कंपनी होने के नाते, Mother Dairy रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D) के खर्चों का बोझ खुद उठा रही है, जबकि प्राइवेट कंपनियां अक्सर यह बोझ ग्राहकों पर डाल देती हैं। इस नई पैकेजिंग का लक्ष्य प्लास्टिक कचरे को कम करना है, जो भारतीय डेयरी सेक्टर के लिए एक बड़ी चुनौती है।
दिल्ली-NCR में टेस्ट रन
शुरुआत में, ये नई बायोडिग्रेडेबल थैलियां दिल्ली-NCR में पेश की जाएंगी, जो कंपनी के कुल रेवेन्यू का करीब 63% हिस्सा है। यह कदम कंपनी के लिए एक बड़ा टेस्ट साबित होगा। पिछले फाइनेंशियल ईयर में 17% की ग्रोथ दर्ज करने वाली Mother Dairy के लिए यह एक लॉजिस्टिकल चुनौती होगी कि वह नई पैकेजिंग के साथ भी प्रोडक्ट की क्वालिटी बनाए रख सके। यह देखना अहम होगा कि ये थैलियां पारंपरिक पॉलीथीन फिल्मों की तरह शेल्फ-लाइफ और मजबूती बनाए रख पाती हैं या नहीं।
चुनौतियां और रिस्क
हालांकि यह कदम पर्यावरण के लिए अच्छा माना जा रहा है, लेकिन इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का कहना है कि ज्यादातर बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक को ठीक से विघटित होने के लिए खास इंडस्ट्रियल कंपोस्टिंग (industrial composting) की जरूरत होती है। अगर ये थैलियां सामान्य लैंडफिल में जाती हैं, तो इनका पर्यावरणीय लाभ कम हो जाएगा। इसके अलावा, Mother Dairy पर दूध खरीद और पैकेजिंग मटेरियल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर पड़ता है। हाल ही में पैकेजिंग मटेरियल की कीमतें 20% बढ़ी हैं। कंपनी किसानों को सही दाम देने के दबाव में है और प्राइवेट कंपनियों से प्रतिस्पर्धा कर रही है, ऐसे में इन नई लागतों को लंबे समय तक झेल पाना मुश्किल हो सकता है।
भविष्य की योजनाएं
कंपनी ने 2026-27 फाइनेंशियल ईयर तक 20% ग्रोथ का लक्ष्य रखा है, यानी टर्नओवर ₹24,000 करोड़ तक पहुंचाने का। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए कंपनी को भौगोलिक विस्तार और सस्टेनेबिलिटी (sustainability) की लागत के बीच संतुलन बनाना होगा। यह देखना बाकी है कि यह पैकेजिंग इनोवेशन एक इंडस्ट्री स्टैंडर्ड बनता है या सिर्फ एक पायलट प्रोजेक्ट बनकर रह जाता है।
