लैब-ग्रोन डायमंड्स: अब छोटे शहरों में भी धूम! ₹80,000 करोड़ के मार्केट पर कब्जा

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AuthorAditya Rao|Published at:
लैब-ग्रोन डायमंड्स: अब छोटे शहरों में भी धूम! ₹80,000 करोड़ के मार्केट पर कब्जा

भारत में लैब-ग्रोन डायमंड्स (LGDs) का चलन अब सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित नहीं रहा। ये डायमंड्स टियर-2 और टियर-3 शहरों में भी तेज़ी से अपनी जगह बना रहे हैं। अभी ये भारत के ₹80,000 करोड़ के डायमंड मार्केट का **10%** हिस्सा हथिया चुके हैं। नेचुरल डायमंड्स की तुलना में **90%** तक सस्ता होना और सोने की बढ़ती कीमतें, इन स्टोन्स को एक लक्ज़री विकल्प से मुख्यधारा में ला रहे हैं। हालांकि, इनके रीसेल वैल्यू (resale value) और रिटेलर्स के मार्जिन पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

डायमंड मार्केट में नया फेज

भारत में लैब-ग्रोन डायमंड्स (LGDs) का बाज़ार एक नए ग्रोथ फेज में प्रवेश कर चुका है। इनकी बिक्री तेज़ी से बड़े शहरों से निकलकर टियर-2 और टियर-3 शहरों तक फैल रही है। इस बदलाव से स्थानीय ज्वेलरी इंडस्ट्री में हलचल मची है, क्योंकि कंज्यूमर्स अब ऐसे सिंथेटिक स्टोन्स को ज़्यादा पसंद कर रहे हैं जो माइन्ड डायमंड्स के समान ही फिजिकल और केमिकल क्वालिटी वाले हैं, लेकिन बहुत कम कीमत पर उपलब्ध हैं।

मार्केट का 10% हिस्सा LGDs के नाम

इंडस्ट्री के आंकड़ों के मुताबिक, LGDs अब भारत के कुल डायमंड मार्केट का लगभग 10% हिस्सा बन चुके हैं। इस मार्केट का कुल आकार करीब ₹80,000 करोड़ का है। इस ट्रेंड का सबसे बड़ा कारण कीमतों का बड़ा अंतर है। आज, एक प्रीमियम लैब-ग्रोन डायमंड, बराबर क्वालिटी वाले नेचुरल डायमंड की तुलना में 90% तक की छूट पर खरीदा जा सकता है। उदाहरण के लिए, एक प्रीमियम LGD कैरट की कीमत ₹50,000 से ₹80,000 के बीच है, जबकि वहीं एक नेचुरल स्टोन की कीमत ₹2 लाख से ₹3.5 लाख तक जाती है। यह बड़ा प्राइस डिफरेंस खास तौर पर 25-45 साल के युवा ग्राहकों को आकर्षित कर रहा है।

सोने की महंगाई और अमेरिकी मॉडल

गोल्ड प्राइसेज में लगातार हो रही बढ़ोत्तरी ने भी इस ट्रेंड को और तेज़ किया है, क्योंकि खरीदार अपने ज्वेलरी बजट को संतुलित करने के तरीके खोज रहे हैं। यह ग्रोथ काफी अहम है और इसकी तुलना अमेरिका से की जा रही है, जहां LGDs ने एक अल्टरनेटिव प्रोडक्ट से एंगेजमेंट ज्वेलरी के लिए एक मुख्यधारा की पसंद का रूप ले लिया है। भारत भी इस डिमांड को पूरा करने के लिए अच्छी स्थिति में है, क्योंकि हमारे पास सालाना लगभग 20 मिलियन कैरट की डोमेस्टिक प्रोडक्शन कैपेसिटी मौजूद है।

रीसेल वैल्यू और मार्जिन पर सवाल

व्यावसायिक सफलता के बावजूद, इंडस्ट्री कुछ खास चुनौतियों का सामना कर रही है जिन पर इन्वेस्टर्स और कंज्यूमर्स को ध्यान देना चाहिए। एक बड़ा रिस्क है रीसेल वैल्यू का न होना। नेचुरल डायमंड्स के विपरीत, जिन्हें अक्सर वैल्यू स्टोर (store of value) माना जाता है, LGDs कमोडिटी (commodity) की तरह हैं जिनकी कीमत समय के साथ नहीं टिकती। जैसे-जैसे प्रोडक्शन एफिशिएंसी (efficiency) बढ़ेगी और ग्लोबल सप्लाई बढ़ेगी, कीमतों में और गिरावट का खतरा है, जो रिटेलर्स और मैन्युफैक्चरर्स के प्रॉफिट मार्जिन को कम कर सकता है।

'नकली' होने की धारणा और टेक्नोलॉजी का असर

इसके अलावा, इंडस्ट्री इस धारणा से भी लड़ रही है कि ये स्टोन्स 'नकली' या कम क्वालिटी वाले हैं। हालांकि कंज्यूमर अवेयरनेस (awareness) बढ़ी है, लेकिन लंबे समय तक रुचि बनाए रखने के लिए यह ज़रूरी होगा कि रिटेलर्स इन स्टोन्स के ऑप्टिकल और फिजिकल क्वालिटी को माइन्ड डायमंड्स से अलग साबित कर पाएं। एक और बात जिस पर नज़र रखनी चाहिए, वह है केमिकल वेपर डिपोजिशन (CVD) और हाई-प्रेशर हाई-टेम्परेचर (HPHT) जैसी मैन्युफैक्चरिंग टेक्नोलॉजीज पर निर्भरता, जहां तेज़ी से टेक्नोलॉजी पुरानी हो सकती है, जो कैपिटल-इंटेंसिव (capital-intensive) फैसिलिटीज को प्रभावित कर सकती है।

आगे क्या?

जैसे-जैसे मार्केट मैच्योर (mature) होगा, सेक्टर के लिए मुख्य बात यह होगी कि क्या रिटेलर्स बढ़ती सप्लाई के बीच अपने ब्रांड वैल्यू को बनाए रख पाएंगे। भविष्य में, Limelight Lab Grown Diamonds और Aukera जैसे बड़े प्लेयर्स की इन्वेंटरी एक्सपेंशन (inventory expansion) योजनाओं और सिंथेटिक ज्वेलरी के एसेट वैल्यू (asset value) को लेकर कंज्यूमर सेंटीमेंट (sentiment) में बड़े बदलावों पर नज़र रखी जाएगी।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.