सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स अब स्टार्टअप फाउंडर्स बन रहे हैं। Cüraa और Pruf जैसे ब्रांड्स में भारी फंडिंग तो आई है, लेकिन ये कंपनियां अभी प्राइवेट हैं और इनके साथ कई तरह के रिस्क जुड़े हुए हैं।
भारत के D2C (डायरेक्ट-टू-कंज्यूमर) मार्केट में एक नया ट्रेंड देखने को मिल रहा है। कंटेंट क्रिएटर्स अब बिजनेस ओनर बन रहे हैं। हाल ही में शेफ संजोत कीर के ब्रांड Cüraa ने ₹40 करोड़ और स्किनकेयर क्रिएटर हिमी खंडेलवाल के ब्रांड Pruf ने ₹8 करोड़ की फंडिंग जुटाई है।
क्यों आकर्षित हो रहे हैं इन्वेस्टर्स?
इन्वेस्टर्स का मानना है कि इन ब्रांड्स के पास अपना पहले से तैयार 'लॉयल ऑडियंस बेस' होता है। पारंपरिक कंपनियों को कस्टमर बनाने के लिए विज्ञापन पर लाखों खर्च करने पड़ते हैं, लेकिन इन स्टार्टअप्स का 'कस्टमर एक्विजिशन कॉस्ट' (CAC) काफी कम होता है। 'ओनली व्हाट इज नीडेड' (OWN) जैसे ब्रांड इसी भरोसे के दम पर हेल्थ सप्लीमेंट जैसे कॉम्पिटिटिव मार्केट में चुनौती दे रहे हैं।
निवेशकों के लिए चेतावनी (Risks for Investors)
सावधान रहें, ये कंपनियां अभी NSE या BSE पर लिस्टेड नहीं हैं। इनका डेटा पब्लिक नहीं है, जिससे इनके वैल्यूएशन और फाइनेंशियल हेल्थ का सही अंदाजा लगाना रिटेल इन्वेस्टर्स के लिए मुश्किल है।
सबसे बड़ा रिस्क 'फाउंडर रिस्क' है। अगर किसी इन्फ्लुएंसर की पर्सनल इमेज खराब होती है, तो ब्रांड को सीधा नुकसान होता है। इसके अलावा, एक सफल क्रिएटर होना और एक सफल बिजनेस चलाना दो बिल्कुल अलग चीजें हैं। कंपनी का भविष्य इस पर टिकेगा कि क्या वे अपनी सोशल मीडिया पॉपुलैरिटी से आगे निकलकर प्रोडक्ट क्वालिटी और सप्लाई चेन को बेहतर बना पाते हैं या नहीं।
