भारतीय खिलौना उद्योग तेजी से उभर रहा है! वित्त वर्ष 2026 तक देश से खिलौनों का एक्सपोर्ट (निर्यात) **$186 मिलियन** तक पहुंच गया है, जबकि 2020 के मुकाबले इंपोर्ट (आयात) में **71%** की भारी गिरावट आई है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इंडस्ट्री को **$179 बिलियन** के ग्लोबल मार्केट में बड़ा हिस्सा हासिल करने का आह्वान किया है।
खिलौना उद्योग में बड़ा बदलाव
भारतीय खिलौना उद्योग इस वक्त एक बड़े परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2026 में देश से खिलौनों का एक्सपोर्ट $186 मिलियन के आंकड़े को पार कर गया है। नई दिल्ली में हाल ही में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय खिलौना एक्सपो में बोलते हुए, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बताया कि अब भारतीय खिलौने 153 देशों तक पहुंच रहे हैं। यह एक्सपोर्ट ग्रोथ लगातार जारी है और 2020 के मुकाबले इंपोर्ट में 71% की बड़ी गिरावट देखी गई है। इससे साफ है कि घरेलू उत्पादन अब विदेशी उत्पादों की जगह ले रहा है।
सरकारी नीतियां और बाजार की सुरक्षा
आयात में आई यह कमी काफी हद तक सरकार की लक्षित पहलों का नतीजा है। साल 2020 में, सरकार ने घरेलू निर्माताओं को सस्ते वैश्विक कंप्टीशन से बचाने के लिए खिलौनों पर बेसिक कस्टम ड्यूटी 20% से बढ़ाकर 60% कर दी थी। इसके अलावा, ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स (BIS) ने आने वाले सामानों को नियंत्रित करने के लिए कड़े सुरक्षा और गुणवत्ता मानक लागू किए हैं। इन नीतियों का मकसद स्थानीय कंपनियों के लिए एक मजबूत नींव तैयार करना है, जिससे वे सिर्फ कीमत पर प्रतिस्पर्धा करने के बजाय क्वालिटी और डिजाइन में निवेश करने पर ध्यान केंद्रित कर सकें।
हाई-वैल्यू प्रोडक्ट्स की ओर रणनीतिक कदम
जहां घरेलू बाजार 2034 तक $5 बिलियन तक पहुंचने की उम्मीद है, वहीं वित्त मंत्री ने निर्माताओं को $179 बिलियन के वैश्विक खिलौना बाजार से एक बड़ा हिस्सा हासिल करने के लिए प्रोत्साहित किया है। इस लक्ष्य को पाने के लिए सिर्फ बेसिक मैन्युफैक्चरिंग से कहीं ज्यादा की जरूरत होगी; इसके लिए हाई-वैल्यू प्रोडक्ट्स जैसे इलेक्ट्रॉनिक खिलौने, कोडिंग-आधारित गेम और ऑगमेंटेड रियलिटी (AR) एक्सपीरियंस पर ध्यान केंद्रित करना होगा। खिलौनों के लिए सरकार की राष्ट्रीय एक्शन प्लान (National Action Plan for Toys) वर्तमान में समर्पित मैन्युफैक्चरिंग क्लस्टर स्थापित करने और स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम प्रदान करके इस बदलाव का समर्थन करने के लिए काम कर रही है।
ग्लोबल ब्रांडिंग की चुनौतियां
भारतीय कंपनियों के लिए, ग्लोबल विस्तार के रास्ते में ब्रांड पहचान से जुड़ी बाधाओं को पार करना एक बड़ी चुनौती है। जैसा कि वित्त मंत्री ने बताया, मैन्युफैक्चरिंग क्षमता समीकरण का सिर्फ एक हिस्सा है, क्योंकि दीर्घकालिक सफलता अक्सर वैश्विक स्तर पर पहचानी जाने वाली ब्रांड बनाने पर निर्भर करती है। यूएई (UAE) और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के साथ ट्रेड एग्रीमेंट्स ड्यूटी-फ्री एक्सेस प्रदान करते हैं, लेकिन भारतीय एक्सपोर्टर्स को अभी भी स्थापित ग्लोबल प्लेयर्स के साथ प्रतिस्पर्धा करनी होगी जिनके पास मजबूत डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क और ब्रांड इक्विटी है। निवेशकों को इस बात पर नजर रखनी चाहिए कि स्थानीय कंपनियां कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरर से आगे बढ़कर अपने उपभोक्ता ब्रांड बनाने में कितनी सफल होती हैं। एक्सपोर्ट ग्रोथ बनाए रखने और मार्जिन में सुधार के लिए रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) और डिजिटल इनोवेशन में लगातार निवेश महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि उद्योग कम लागत वाले प्लास्टिक गुड्स से हटकर अधिक जटिल, वैल्यू-ऐडेड सेगमेंट की ओर बढ़ रहा है।
