बड़ा दांव: मंज़ूरी से पहले ही प्रोजेक्ट्स पर काम शुरू!
Dixon Technologies और PG Electroplast जैसी भारत की दिग्गज इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों ने चीनी फर्मों के साथ मिलकर बड़े प्रोजेक्ट्स शुरू कर दिए हैं, जबकि केंद्र सरकार की अहम 'Press Note 3' (PN3) मंज़ूरी का इंतज़ार अभी बाकी है। फैक्टरी निर्माण और मशीनरी के ऑर्डर जैसे कदम उठाने का यह फैसला, चीन की लेटेस्ट टेक्नोलॉजी का फायदा उठाने और अपने बिजनेस प्लान को समय पर पूरा करने की मजबूरी को दिखाता है। यह एक ऐसा हाई-स्टेक (high-stakes) दांव है, जहाँ कंपनियां इस उम्मीद में आगे बढ़ रही हैं कि रेगुलेटरी मंज़ूरी मिल जाएगी। यह कदम सीधे तौर पर 12 महीने तक की देरी से बचने के लिए उठाया गया है।
क्यों उठा रही हैं कंपनियां ये कदम?
यह बड़ा कदम, कंपनियां चीन की टेक्नोलॉजी का फायदा उठाने और अपने बिजनेस प्लान को पटरी से उतरने से बचाने के लिए उठा रही हैं। सरकार की Press Note 3 (PN3) के तहत चीनी कंपनियों के साथ ज्वाइंट वेंचर (JV) या टेक्नोलॉजी एलायंस को मंज़ूरी मिलने में 12 महीने तक की देरी हो रही है। इस देरी से बचने के लिए, कंपनियां सीधे फैक्टरी का निर्माण और ज़रूरी मशीनरी के ऑर्डर दे रही हैं। ये कंपनियां इस उम्मीद पर दांव लगा रही हैं कि या तो सरकार जल्दी मंज़ूरी दे देगी, या फिर अगर मंज़ूरी नहीं मिली तो वे इन प्रोजेक्ट्स को पूरी तरह अपनी मालिकाना हक वाली सब्सिडियरी (wholly-owned subsidiary) के तौर पर चलाएंगी।
Dixon और PG Electroplast के दांव
Dixon Technologies, जो भारत की सबसे बड़ी इलेक्ट्रॉनिक्स कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरर है, डिस्प्ले मॉड्यूल बनाने के लिए नई फैक्टरी का निर्माण शुरू कर चुकी है और ज़रूरी मशीनरी की शिपमेंट भी आ चुकी है। यह फैक्टरी चीन की HKC Corp के साथ 74:26 के ज्वाइंट वेंचर में बन रही है। कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर अतुल लाल का कहना है कि प्रोडक्शन PN3 मंज़ूरी पर निर्भर नहीं है, हालांकि उन्होंने पार्टनरशिप के लिए इसकी अहमियत बताई है। उनका भरोसा है कि PN3 और प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम, दोनों की मंज़ूरी मिल जाएगी। अगर PN3 नहीं मिली, तो प्लांट पूरी तरह से Dixon का होगा।
इसी तरह, PG Electroplast, जो होम अप्लायंसेज बनाती है, पुणे के पास एयर कंडीशनर कंप्रेसर प्लांट का निर्माण कर रही है। यह चीन के बड़े कंप्रेसर निर्माता Shanghai Highly Group के साथ एक टेक्निकल एलायंस है, जिसमें इक्विटी (equity) का कोई क्लॉज (clause) नहीं है। इस एलायंस को चीनी रेगुलेटर्स (regulators) से मंज़ूरी मिलने में करीब एक साल लग गया है। PG Electroplast के CFO उम्मीद जता रहे हैं कि यह जल्दी ही फाइनल हो जाएगा।
बाजार की नजरें इन कंपनियों पर हैं। Dixon Technologies का मार्केट कैपिटलाइज़ेशन (market capitalization) करीब ₹45,000 करोड़ है और इसका P/E रेश्यो (ratio) लगभग 70x है, जो सरकारी इंसेंटिव्स से मिलने वाली ग्रोथ पर निवेशक के भरोसे को दिखाता है। वहीं, PG Electroplast का मार्केट कैप करीब ₹5,000 करोड़ और P/E रेश्यो लगभग 80x है, जो इसकी आक्रामक विस्तार योजनाओं के लिए प्रीमियम को दर्शाता है।
भू-राजनीतिक चुनौतियां और इंडस्ट्री का माहौल
ये कदम भारत सरकार द्वारा चीन से होने वाले फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) पर बढ़ी निगरानी के बीच उठाए जा रहे हैं, जो राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं से जुड़ी है। PN3 के तहत, चीनी कंपनियों के साथ जुड़ने वाले प्रोजेक्ट्स को क्लियरेंस मिलने में अक्सर 6 से 18 महीने लग जाते हैं, जिससे ऑपरेशनल दिक्कतें आती हैं।
भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर तेजी से बढ़ रहा है, सालाना 15-20% की ग्रोथ अनुमानित है। PLI स्कीम और सप्लाई चेन को डाइवर्सिफाई (diversify) करने का ग्लोबल ट्रेंड इसका मुख्य कारण है। Dixon और PG Electroplast इस मौके का फायदा उठाने की कोशिश कर रही हैं। उनके प्रतिस्पर्धी जैसे Amber Enterprises और Lavelle भी विस्तार कर रहे हैं, लेकिन शायद उन्होंने घरेलू पार्टनरशिप पर ज़ोर दिया हो या अलग तरीके से मंज़ूरी ली हो। 2020 जैसे समय में भू-राजनीतिक तनावों के चलते चीनी निवेशों पर सावधानी बढ़ जाती है, फिर भी कई प्रोजेक्ट्स इन चुनौतियों से पार पाने में सफल रहे हैं।
क्या हो सकता है बुरा?
बिना पक्की सरकारी मंज़ूरी के पैसा लगाना Dixon Technologies और PG Electroplast के लिए बड़ा जोखिम हो सकता है। अगर PN3 सीधे तौर पर रिजेक्ट (reject) हो जाती है, तो इन महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट्स को काफी महंगे दामों पर दोबारा प्लान (recalibrate) करना पड़ेगा। इसमें मशीनरी बेचना, कॉन्ट्रैक्ट्स को फिर से नेगोशिएट (negotiate) करना या चीनी पार्टनर की टेक्नोलॉजी के बिना पूरी तरह अपनी सब्सिडियरी के तौर पर चलाना शामिल हो सकता है। इससे वे Amber Enterprises या दूसरे अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों के मुकाबले पिछड़ सकते हैं, जिन्होंने अपनी मंज़ूरियां हासिल कर ली हैं।
कुछ निवेशक कंपनी मैनेजमेंट की बातों, जैसे अतुल लाल का यह दावा कि PN3 मंज़ूरी 'ज़रूर मिलेगी', को ज़रूरत से ज़्यादा आत्मविश्वास मान सकते हैं। चूंकि PN3 राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए है और चीन से टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का मामला संवेदनशील है, इसलिए तत्काल और बिना शर्त मंज़ूरी मिलना आसान नहीं है। इसके अलावा, जो मशीनरी ऑर्डर की गई हैं, उनका एक बड़ा हिस्सा शायद भारतीय पोर्ट्स पर पहुंच चुका हो, जिससे डेमरेज (demurrage) खर्च बढ़ सकता है और अगर प्रोजेक्ट्स में बड़े बदलाव हुए या वे रुके, तो सीधे पैसों का नुकसान होगा। चीनी पार्टनर्स पर टेक्नोलॉजी के लिए निर्भरता एक रणनीतिक फायदा है, पर अगर पार्टनरशिप की रूपरेखा रेगुलेटरी दखल से बदल जाती है, तो यह एक बड़ी कमजोरी भी बन सकती है।
आगे का रास्ता
एनालिस्ट्स (Analysts) का मानना है कि PLI स्कीम और भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग की बढ़ती मांग के चलते Dixon Technologies और PG Electroplast के लिए लंबी अवधि के अवसर मज़बूत हैं। हालांकि, एग्जीक्यूशन रिस्क (execution risks) और क्रॉस-बॉर्डर सहयोगों के लिए रेगुलेटरी मंज़ूरी की गति हमेशा चिंता का विषय रही है।
PN3 की बाधाओं को सफलतापूर्वक पार करना इन कंपनियों की भविष्य की ग्रोथ रेट्स (growth rates) और एनालिस्ट्स की रेटिंग (rating) में बदलाव का एक बड़ा निर्धारक होगा। वर्तमान में मंज़ूरी से पहले आगे बढ़ने की रणनीति से यह पता चलता है कि मैनेजमेंट को वैकल्पिक ऑपरेशनल मॉडल के ज़रिए प्रोजेक्ट्स के जोखिम को कम करने का भरोसा है। हालांकि, बाजार तब तक इन निवेशों का पूरा वैल्यू तभी मानेगा जब मंज़ूरी के ठोस संकेत मिलेंगे या वे आत्मनिर्भरता का स्पष्ट रास्ता दिखा पाएंगे।