भारत का रिफर्बिश्ड (Refurbished) इलेक्ट्रॉनिक्स बाज़ार ज़ोरों पर है। यह बाज़ार सालाना **12%** की रफ़्तार से बढ़ रहा है, और इसकी वजह अनऑर्गनाइज्ड (unorganized) से ऑर्गेनाइज्ड (organized) प्लेयर्स का बढ़ता दबदबा है। मेट्रो शहरों के ग्राहक अब क्वालिटी और वारंटी को देखते हुए सर्टिफाइड प्री-ओन्ड (certified pre-owned) डिवाइस, खासकर प्रीमियम स्मार्टफ़ोन को ज़्यादा पसंद कर रहे हैं। कंपनियों के लिए ट्रेड-इन (trade-in) डिवाइस की लगातार सप्लाई बनाए रखना बाज़ार में अपनी पैठ बढ़ाने के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ है।
6 अरब डॉलर के बाज़ार में बड़ा बदलाव
भारत में इस्तेमाल किए गए इलेक्ट्रॉनिक्स का बाज़ार एक बड़े ट्रांसफॉर्मेशन (transformation) से गुज़र रहा है। ऑर्गेनाइज्ड रिटेल प्लेयर्स इस $6 अरब की इंडस्ट्री में अपनी हिस्सेदारी लगातार बढ़ा रहे हैं। भले ही अभी भी कुल बाज़ार का करीब 85% हिस्सा अनऑर्गनाइज्ड सेक्टर के पास है, लेकिन पिछले एक दशक में ऑर्गेनाइज्ड कंपनियों की हिस्सेदारी लगभग शून्य से बढ़कर 15% से 20% तक पहुँच गई है। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि ग्राहक अब लोकल अनौपचारिक सेलर्स से हटकर उन ब्रांड्स की तरफ़ जा रहे हैं जो सर्टिफाइड क्वालिटी, वारंटी और भरोसेमंद आफ्टर-सेल्स सपोर्ट देते हैं।
मेट्रो शहरों में बदलती ग्राहकों की पसंद
रिफर्बिश्ड टेक्नोलॉजी की डिमांड अब सिर्फ टियर-II और टियर-III शहरों तक सीमित नहीं है, जहाँ लोग सिर्फ़ कम कीमत देखते थे। अब मेट्रो मार्केट्स बिक्री का एक बड़ा हिस्सा हैं, जहाँ खरीदार सिर्फ़ डिस्काउंट के बजाय प्रीमियम हार्डवेयर पर फ़ोकस कर रहे हैं। इस सेगमेंट में फिलहाल Apple डिवाइसेस का दबदबा है, जो भारत में इस्तेमाल किए गए स्मार्टफ़ोन बाज़ार का आधे से ज़्यादा हिस्सा कवर करते हैं। जैसे-जैसे Apple देश में अपने नए डिवाइसेस की बिक्री बढ़ा रहा है, सेकेंडरी मार्केट को भी बेहतर क्वालिटी वाले प्रीमियम प्रोडक्ट्स की लगातार सप्लाई मिल रही है, जो रिफर्बिशमेंट के लिए तैयार हो रहे हैं।
सप्लाई चेन इंफ्रास्ट्रक्चर की अहमियत
इस सेक्टर में काम कर रही कंपनियों के लिए ग्रोथ काफी हद तक डिवाइसेस की स्टेबल इन्वेंटरी (stable inventory) हासिल करने पर निर्भर करती है। रिटेलर्स द्वारा चलाए जा रहे ट्रेड-इन प्रोग्राम्स फिलहाल नए डिवाइस की बिक्री का करीब 25% योगदान देते हैं, और उम्मीद है कि आने वाले सालों में यह आंकड़ा 40% तक जा सकता है। कॉम्पिटिशन में बने रहने के लिए, कंपनियाँ इलेक्ट्रॉनिक्स चेन, इंश्योरेंस प्रोवाइडर्स, लॉजिस्टिक्स फर्म्स और ऑथोराइज्ड रीसेलर्स के साथ पार्टनरशिप करके कॉम्प्लेक्स सप्लाई नेटवर्क्स बना रही हैं। यह सप्लाई-साइड स्ट्रैटेजी (supply-side strategy) बेहद ज़रूरी है, क्योंकि इन बिज़नेस की सफलता ग्राहकों की बढ़ती डिमांड को पूरा करने के लिए पर्याप्त हाई-क्वालिटी डिवाइसेस सोर्स करने की उनकी क्षमता पर निर्भर करती है।
चुनौतियाँ और भविष्य का नज़रिया
हालांकि यह सेक्टर तेज़ी से बढ़ रहा है, लेकिन इसे कुछ खास चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। सबसे बड़ी रुकावट अपने ऑपरेशंस (operations) को बढ़ाने के लिए पर्याप्त डिवाइसेस सोर्स करने में आने वाली कठिनाई है। इसके अलावा, इंडस्ट्री को अनऑर्गनाइज्ड सेक्टर से खुद को अलग करने के लिए स्ट्रिक्ट क्वालिटी कंट्रोल (strict quality control) बनाए रखना होगा, जहाँ अक्सर स्टैंडर्ड टेस्टिंग प्रोसीजर (standard testing procedures) की कमी होती है। इस स्पेस पर नज़र रखने वाले इन्वेस्टर्स (investors) इस बात पर ध्यान दे सकते हैं कि ऑर्गेनाइज्ड प्लेयर्स अपनी सोर्सिंग पार्टनरशिप्स को कैसे मैनेज करते हैं और क्या वे मार्जिन बनाए रखते हुए रिफर्बिशमेंट की लागत को सफलतापूर्वक कम कर पाते हैं। सर्टिफाइड प्रोडक्ट्स की ओर यह रुझान जारी रहने की उम्मीद है, और ऑर्गेनाइज्ड प्लेयर्स का लक्ष्य अगले पाँच सालों में बाज़ार का 30% से 40% हिस्सा हासिल करना है।
