Raksha Bandhan अब सिर्फ धागों का त्योहार नहीं रहा, बल्कि यह **₹32,000 करोड़** का बड़ा कंजम्पशन इवेंट बन चुका है। पेट-केयर, प्रीमियम बेकरी और पर्सनल गिफ्ट्स जैसी कैटेगरी में **₹7,000 करोड़** का अतिरिक्त खर्च हो रहा है, जिससे रिटेलर्स को मार्जिन बढ़ाने का मौका मिल रहा है।
भारतीय रिटेल मार्केट में रक्षाबंधन का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। अब यह एक साधारण रस्म से आगे बढ़कर एक बड़े बिजनेस इवेंट में तब्दील हो गया है। Confederation of All India Traders के अनुमानों के मुताबिक, जहां ट्रेडिशनल राखियों का बाजार ₹25,000 करोड़ के आसपास है, वहीं कुल फेस्टिव ट्रेड इस साल ₹30,000 करोड़ से ₹32,000 करोड़ तक पहुंचने की उम्मीद है। इस बढ़त के पीछे पेट-केयर प्रोडक्ट्स और प्रीमियम बेकरी जैसे नए सेगमेंट्स का बड़ा हाथ है।
प्रीमियम और पर्सनल गिफ्टिंग का दौर
रिटेलर्स अब कम मार्जिन वाले मास-मार्केट प्रोडक्ट्स के बजाय हाई-वैल्यू आइटम पर जोर दे रहे हैं। डिजाइनर और जेमस्टोन वाली राखियों की डिमांड तेजी से बढ़ी है। मिठाई की जगह अब Theobroma, Magnolia Bakery और Bakingo जैसे ब्रांड्स की प्रीमियम बेकरी आइटम्स ले रही हैं। साथ ही, पेट्स के लिए स्पेशल बैंडाना और ट्रीट जैसे प्रोडक्ट्स भी बाजार में धूम मचा रहे हैं, जिससे कंपनियों को ग्राहकों के वॉलेट में ज्यादा हिस्सा बनाने का मौका मिल रहा है।
क्विक-कॉमर्स बना गेम चेंजर
त्योहारी डिमांड को भुनाने में क्विक-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स ने बड़ी भूमिका निभाई है। फेस्टिव फूड ऑर्डर्स में 32.4% की बढ़ोतरी देखी गई है, जबकि नॉन-मेट्रो शहरों में यह रफ्तार 38.1% रही है। कम समय में डिलीवरी होने के कारण अब आखिरी मिनट में खरीदारी करना आसान हो गया है।
निवेशकों के लिए जोखिम और अवसर
भले ही कंजम्पशन बढ़ा है, लेकिन निवेशकों को कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए। क्विक-कॉमर्स पर अधिक निर्भरता के चलते लॉजिस्टिक्स का दबाव बना रहता है, जिससे सर्विस क्वालिटी पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा, बाजार में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और डिस्काउंट के दौर से कंपनियों के मार्जिन पर दबाव दिख सकता है। अंत में, यह सब खर्च डिस्क्रिशनरी स्पेंडिंग पर निर्भर करता है, जो ग्राहकों की कॉन्फिडेंस और डिस्पोजेबल इनकम से सीधे जुड़ा है।
