भारत में प्रोटीन की दुनिया में एक बड़ा और रोमांचक बदलाव देखने को मिल रहा है। जो प्रोटीन कभी सिर्फ बॉडीबिल्डर्स या फिटनेस के शौकीनों का खास हिस्सा माना जाता था, वह अब आम लोगों की रोज़मर्रा की सेहत का अहम अंग बनता जा रहा है। खासकर COVID-19 के बाद लोगों में अपनी सेहत और इम्युनिटी को लेकर जागरूकता बढ़ी है, जिसके चलते प्रोटीन का इस्तेमाल अब हर उम्र, हर जगह और हर बजट वाले लोग कर रहे हैं। इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि भारतीय प्रोटीन सप्लीमेंट्स मार्केट साल 2033 तक लगभग ₹13,186 करोड़ का हो जाएगा, और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स पर तो ग्रोथ पहले ही इन अनुमानों को पीछे छोड़ रही है। यह दिखाता है कि प्रोटीन अब सिर्फ बॉडी बनाने का साधन नहीं, बल्कि ओवरऑल वेलनेस के लिए ज़रूरी हो गया है।
इस मार्केट के तेजी से बढ़ने की एक बड़ी वजह 'प्रीमियमाइजेशन' का चलन है। यानी, लोग अब ज़्यादा कीमत वाले लेकिन बेहतर क्वालिटी के प्रोडक्ट्स की ओर बढ़ रहे हैं। ₹4,500 से ऊपर की कीमत वाले SKUs, कम कीमत वाले विकल्पों की तुलना में 3.5 गुना तेज़ी से बिक रहे हैं। इसका मतलब है कि कंज्यूमर अब साफ़ इंग्रेडिएंट्स, नेचुरल स्वीटनर्स और कम चीनी वाले प्रोडक्ट्स पसंद कर रहे हैं। साथ ही, बड़े पैक्स जो यूनिट इकोनॉमिक्स के लिहाज़ से बेहतर हों, उनकी भी मांग बढ़ रही है। प्लांट-बेस्ड प्रोटीन सेगमेंट में भी ज़बरदस्त ग्रोथ दिख रही है, जो सिर्फ डाइट की ज़रूरतें पूरी करने के लिए नहीं, बल्कि लाइफस्टाइल का हिस्सा और क्लीन-लेबल की पसंद के तौर पर देखा जा रहा है।
सिर्फ पाउडर के अलावा, नए-नए फॉर्मेट्स में प्रोडक्ट्स आना भी प्रोटीन को ज़्यादा लोगों तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभा रहा है। प्रोटीन बार्स, रेडी-टू-ड्रिंक (RTD) बेवरेजेज़, गमीज़, मेल्ट्स और फोर्टिफाइड स्टेपल्स जैसे प्रोडक्ट्स में ज़बरदस्त ईयर-ऑन-ईयर ग्रोथ देखी जा रही है। ये कन्वीनिएंट ऑप्शन्स ऑफिस जाने वालों, महिलाओं और पहली बार प्रोटीन इस्तेमाल करने वालों को बहुत पसंद आ रहे हैं, जिन्हें शायद पारंपरिक शेक्स डराने वाले या इस्तेमाल करने में मुश्किल लगते हों। इससे प्रोटीन लेना अब मुश्किल नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की आदत बनती जा रही है। खास तौर पर RTD सेगमेंट में अच्छी ग्रोथ बता रही है कि लोग 'ऑन-द-गो' पोषण के समाधान पसंद कर रहे हैं।
पहले जहां प्रोटीन मार्केट सिर्फ बड़े शहरों (मेट्रोज़) तक सीमित था, अब इसका दायरा बहुत बढ़ गया है। टियर 2 और टियर 3 शहरों में भी ग्रोथ की रफ्तार मेट्रो शहरों के बराबर पहुंच रही है, और इन इलाकों में ओवरऑल ग्रोथ लगभग 40-45% के करीब है। यह पूरे देश में प्रोटीन की पहुंच का संकेत है। बढ़ी हुई डिस्पोजेबल इनकम, बेहतर डिजिटल लिटरेसी और ई-कॉमर्स व क्विक-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स के विस्तार ने इन प्रोडक्ट्स को देश भर में सुलभ बना दिया है। अब ग्रोथ का अगला बड़ा हिस्सा इन बड़े शहरों के 'भारत' से ही आने की उम्मीद है।
कुल मिलाकर, भारत का न्यूट्रिशनल सप्लीमेंट्स मार्केट करीब USD 35.25 बिलियन का है, जिसे सेहत के प्रति बढ़ती जागरूकता, ज़्यादा खर्च करने की क्षमता और प्लांट-बेस्ड व पर्सनलाइज़्ड फॉर्मूलेशन की डिमांड बढ़ा रही है। प्रोटीन सप्लीमेंट्स इसमें एक बड़ा सेगमेंट हैं, जिनके साल 2033 तक USD 1.52 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है, जिसकी कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) करीब 6.6% रह सकती है। ग्लोबल ब्रांड्स जैसे Optimum Nutrition और Dymatize के साथ-साथ MuscleBlaze, Oziva और TrueBasics जैसे इंडियन ब्रांड्स भी प्लांट-बेस्ड और क्लीन-लेबल विकल्पों की मांग पूरी कर रहे हैं। प्लांट-बेस्ड प्रोटीन मार्केट तो खासकर 14.36% की CAGR से बढ़कर 2034 तक USD 2,251.7 मिलियन तक पहुंचने का अनुमान है।
लेकिन इस ज़बरदस्त ग्रोथ के बावजूद, प्रोटीन मार्केट के सामने कुछ चुनौतियां भी हैं। अफोर्डेबिलिटी (सामर्थ्य) अब भी एक मुद्दा है, खासकर कम आय वाले वर्गों के लिए। इम्पोर्टेड प्रोडक्ट्स की ऊंची कीमत अक्सर एक समस्या होती है। मार्केट में कई ब्रांड्स की मौजूदगी के कारण प्रतिस्पर्धा बहुत ज़्यादा है, जिसके लिए लगातार इनोवेशन और मार्केटिंग ज़रूरी है। नकली प्रोडक्ट्स (Counterfeit products) भी एक बड़ा खतरा हैं, जो कंज्यूमर के भरोसे और ब्रांड की साख को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसके अलावा, न्यूट्रास्यूटिकल्स और हेल्थ सप्लीमेंट्स के लिए भारत में रेगुलेटरी (नियामक) माहौल FSSAI के तहत काफी जटिल और लगातार बदलता रहता है। प्रोडक्ट रजिस्ट्रेशन, लेबलिंग और दावों (claims) के नियमों का पालन करना बेहद ज़रूरी है, नहीं तो रेगुलेटरी दिक्कतें आ सकती हैं। प्रोडक्ट की सुरक्षा, क्वालिटी और सही जानकारी देना सबसे अहम है।
भारत में प्रोटीन मार्केट का भविष्य काफी उम्मीदों भरा है। कैटेगरी एजुकेशन, फंक्शनल ब्लेंड्स, रोज़मर्रा के खाने में प्रोटीन का फोर्टिफिकेशन और नए फॉर्मेट्स में लगातार इनोवेशन होते रहेंगे। जैसे-जैसे कंज्यूमर पोषण की कमियों और प्रिवेंटिव हेल्थकेयर के बारे में ज़्यादा जागरूक होंगे, यह इंडस्ट्री रिएक्टिव सप्लीमेंटेशन से हटकर प्रोएक्टिव डेली वेलनेस की ओर बढ़ेगी। एनालिस्ट्स को ग्रोथ जारी रहने की उम्मीद है, जिसमें ई-कॉमर्स और डिजिटल चैनल मार्केट तक पहुंच और कंज्यूमर एंगेजमेंट में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। क्लीन-लेबल प्रोडक्ट्स, लोकल फ्लेवर्स और भारतीय कंज्यूमर के लिए खास फंक्शनल बेनिफिट्स पर फोकस बना रहेगा, जो भारत के हेल्थ और वेलनेस इकोसिस्टम में प्रोटीन की पहचान को और मज़बूत करेगा।