भारत के स्नैक मार्केट में क्रांति! प्रीमियम 'चैलेंजर' ब्रांड्स का बढ़ा दबदबा, ITC-Britannia जैसे दिग्गजों को कड़ी टक्कर

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
भारत के स्नैक मार्केट में क्रांति! प्रीमियम 'चैलेंजर' ब्रांड्स का बढ़ा दबदबा, ITC-Britannia जैसे दिग्गजों को कड़ी टक्कर
Overview

भारतीय खाने-पीने के बाजार में एक बड़ा बदलाव आ रहा है। ग्राहक अब सिर्फ सस्ती चीज़ों की जगह क्वालिटी, इनोवेशन और हेल्थ वाले प्रीमियम स्नैक्स को तरजीह दे रहे हैं। इस ट्रेंड से स्नैक मार्केट में हलचल मच गई है, जिसके **₹95,000 करोड़** से ज्यादा तक पहुंचने का अनुमान है। Natch जैसे छोटे और फुर्तीले ब्रांड्स, ITC और Britannia जैसे बड़े नामों को पीछे छोड़ते हुए आगे निकल रहे हैं।

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क्यों हो रहा है प्रीमियम का बोलबाला?

इस बदलाव की मुख्य वजह हैं आज के भारतीय ग्राहक। युवा पीढ़ी, शहरी आबादी, जो अक्सर बाहर घूमती-फिरती है और इंटरनेट से जुड़ी रहती है, नई ग्लोबल फ्लेवर और फूड ट्रेंड्स को अपनाने में आगे है। 2025 में क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स ने विदेशी स्नैक्स की डिमांड को और बढ़ाया। साथ ही, लोग अब हेल्थ को लेकर ज्यादा जागरूक हैं। वे ऐसे प्रोडक्ट्स ढूंढ रहे हैं जिनमें साफ-सुथरे इंग्रेडिएंट्स हों, पौष्टिक फायदे मिलें और जानकारी स्पष्ट हो। ज्यादातर लोग अब प्रिजर्वेटिव-फ्री (preservative-free) चीजों को पसंद कर रहे हैं और ईको-फ्रेंडली (eco-friendly) पैकेजिंग को महत्व दे रहे हैं। अकेले इंडियन स्नैक बार सेगमेंट में सालाना 13% से ज्यादा की ग्रोथ देखी जा रही है, जो एक्टिव लाइफस्टाइल के लिए पौष्टिक और पोर्टेबल ऑप्शन की मांग को पूरा कर रहा है।

छोटे ब्रांड्स ला रहे हैं नए आइडिया

इस बदलते बाजार ने नए 'चैलेंजर' ब्रांड्स के लिए रास्ता बनाया है। पुराने बड़े प्लेयर्स के विपरीत, जो बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन और कीमत पर ध्यान देते थे, ये नए एंट्रैंट्स (entrants) डिज़ाइन, शानदार ब्रांड स्टोरी और अनोखे प्रोडक्ट इनोवेशन पर जोर दे रहे हैं। मुंबई की कंपनी Natch इसका एक बड़ा उदाहरण है। यह ग्लोबल फ्लेवर, साफ-सुथरी इंग्रेडिएंट लिस्ट और नए फॉर्मेट्स, जैसे थाई-स्टाइल राइस चिप्स (Thai-style rice chips) और मॉडर्न मिलेट-आधारित (millet-based) प्रोडक्ट्स पर फोकस कर रही है, न कि सिर्फ कीमत से मुकाबला करने पर। 2017 में बनी Natch ने सीड फंडिंग (seed funding) हासिल की है और अपने ऑनलाइन सेल्स को बढ़ा रही है, साथ ही क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स का भी फायदा उठा रही है। यह स्ट्रेटेजी (strategy) उन्हें अपने प्रोडक्ट्स को सिर्फ कमोडिटी (commodity) नहीं, बल्कि एक 'एक्सपीरियंस' (experience) के तौर पर पेश करने में मदद करती है, जो आज के ग्राहकों को पसंद आ रहा है।

बड़े प्लेयर्स भी बदल रहे हैं चाल

ITC और Britannia जैसे स्थापित बड़े ब्रांड्स भी इस बदलाव पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं, हालांकि उनके पुराने मॉडलों में अपनी चुनौतियां हैं। ITC, जिसके पास स्नैक्स से लेकर स्टेपल्स (staples) तक का डायवर्सिफाइड (diversified) पोर्टफोलियो (portfolio) है, अपने FMCG सेगमेंट में रेवेन्यू ग्रोथ (revenue growth) और स्टेबल EBITDA मार्जिन (EBITDA margins) दर्ज कर रहा है। लेकिन, पिछले साल ITC के स्टॉक ने मार्केट को अंडरपरफॉर्म (underperform) किया है। दूसरी ओर, Britannia, Good Day और Marie Gold जैसे ब्रांड्स के साथ एक मजबूत मार्केट पोजीशन बनाए हुए है, लेकिन उसे कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है और उसका P/E रेशियो (ratio) करीब 55.1 है। Jubilant FoodWorks, जो Domino's और Popeyes जैसे ब्रांड्स चलाती है, अपने स्टोर नेटवर्क का तेजी से विस्तार कर रही है और फ्री डिलीवरी (free delivery) व बेहतर प्रोडक्ट ऑफर्स (offers) जैसी वैल्यू इनिशिएटिव्स (initiatives) पर ध्यान दे रही है। हाल ही में Dunkin' Donuts से बाहर निकलना कंपनी के लिए एक स्ट्रेटेजिक शिफ्ट (strategic shift) दिखाता है, जहां वह अपने कोर स्ट्रेंथ्स (core strengths) पर फोकस कर रही है। कुछ एनालिस्ट्स (analysts) इसे एक टर्नअराउंड कैटेलिस्ट (turnaround catalyst) के तौर पर देख रहे हैं, हालांकि इसका P/E रेशियो 90 से ऊपर इंडस्ट्री के मुकाबले काफी ज्यादा है। कुल मिलाकर, फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री में बड़े पैमाने पर निवेश देखा जा रहा है, जिसके 2028 तक 547.3 बिलियन USD तक पहुंचने का अनुमान है।

चुनौतियां और नए नियम

प्रीमियमाइजेशन (premiumisation) के इस उम्मीद भरे माहौल के बावजूद, कई जोखिम बने हुए हैं। चैलेंजर्स के लिए सबसे बड़ी चुनौती है प्रोडक्शन और डिस्ट्रीब्यूशन (distribution) को तेजी से बढ़ाना, बिना प्रोडक्ट क्वालिटी या ब्रांड की पहचान को नुकसान पहुंचाए। घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय दोनों खिलाड़ियों से कड़ी प्रतिस्पर्धा, साथ ही इनपुट कॉस्ट (input costs) बढ़ने से मार्जिन पर दबाव लगातार बना हुआ है। वहीं, बड़े प्लेयर्स के पैमाने (scale) के बावजूद, अगर वे प्रीमियम ग्राहक की मांग के अनुसार तेजी से नहीं बदले, तो वे फुर्तीले प्रतिस्पर्धियों से पिछड़ सकते हैं। फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) जैसे रेगुलेटरी बॉडीज (regulatory bodies) 'क्लीन लेबल' (clean label) दावों पर भी अपनी पैनी नजर रख रही हैं। 2026 से, ब्रांड्स को 'नेचुरल' (natural) या 'प्रिजर्वेटिव-फ्री' (preservative-free) जैसे दावों का समर्थन करने के लिए विशेष वैज्ञानिक प्रमाण (scientific evidence) देना होगा, जिससे उन कंपनियों पर जुर्माना लग सकता है जो सिर्फ मार्केटिंग के लिए ऐसे शब्द इस्तेमाल करती हैं। इसका मतलब है कि ब्रांड्स को असल में प्रोडक्ट्स में सुधार लाना होगा और पारदर्शी (transparent) रहना होगा।

भारतीय स्नैक्स का भविष्य

भारतीय स्नैकिंग और व्यापक फूड एंड बेवरेज इंडस्ट्री का भविष्य उन ब्रांड्स के लिए उज्ज्वल है जो स्वाद, सेहत और आकर्षक कहानियों को ईमानदारी से पेश करते हैं। एनालिस्ट्स (analysts) इस सेक्टर को लेकर पॉजिटिव (positive) हैं और बढ़ती आय, शहरीकरण, और सुविधाजनक, सेहतमंद और ग्लोबल-स्टाइल (global-style) उत्पादों की मांग से लगातार ग्रोथ की उम्मीद कर रहे हैं। जो ब्रांड्स प्रीमियम इंग्रेडिएंट्स (ingredients), इनोवेटिव फॉर्मूलेशन (formulations) और पारदर्शी कम्युनिकेशन (communication) में माहिर होंगे, वे इस डायनामिक (dynamic) मार्केट में हिस्सेदारी हासिल करने और उपभोक्ताओं का विश्वास जीतने के लिए सबसे बेहतर स्थिति में होंगे।

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