भारत का प्रीमियम एग मार्केट सालाना **15%** से ज्यादा की रफ्तार से बढ़ रहा है। अर्बन डिमांड और क्विक-कॉमर्स के चलते भले ही इसमें तेजी है, लेकिन स्टैंडर्ड क्वालिटी और हाई प्राइसिंग को लेकर निवेशकों को सतर्क रहने की जरूरत है।
भारत के शहरी परिवारों में अब सामान्य अंडों की जगह ओमेगा-3 और फ्री-रेंज जैसे प्रीमियम अंडों का चलन तेजी से बढ़ रहा है। कंपनियों के लिए यह एक मुनाफे वाला सेगमेंट है, लेकिन इसके साथ ही ब्रांड्स के दावों की सत्यता और क्वालिटी वेरिफिकेशन पर सवाल भी उठने लगे हैं।
प्राइसिंग और लागत का गणित
ये प्रीमियम अंडे सामान्य अंडों की तुलना में 3 से 4 गुना महंगे बिक रहे हैं। कंपनियां इसके लिए बेहतर फार्मिंग और फीड का तर्क देती हैं, लेकिन पोल्ट्री फार्मिंग में कुल खर्च का 75% हिस्सा केवल फीड पर जाता है। फीड की बढ़ती कीमतों का सीधा असर इन कंपनियों के नेट प्रॉफिट मार्जिन पर पड़ रहा है।
क्वालिटी का संकट और रेगुलेटरी रिस्क
इस मार्केट की सबसे बड़ी समस्या है एक स्टैंडर्ड नेशनल सर्टिफिकेशन सिस्टम की कमी। यूरोपीय देशों की तरह भारत में अंडों पर कोई अनिवार्य स्टैम्पिंग सिस्टम नहीं है। ऐसे में 'हेल्थ बेनिफिट्स' के दावों की पुष्टि करना मुश्किल हो जाता है। यदि भविष्य में रेगुलेटरी बॉडीज ने पारदर्शिता (Transparency) को लेकर कड़े नियम लागू किए, तो ब्रांड्स के लिए अपनी विश्वसनीयता बनाए रखना बड़ी चुनौती होगी।
क्या है मार्केट का भविष्य?
क्विक-कॉमर्स की बदौलत इन अंडों की पहुंच बढ़ी है, लेकिन यह अभी भी कुल घरेलू खपत के 3% से कम का हिस्सा है। भारतीय उपभोक्ता अभी भी प्राइस-सेंसिटिव हैं। जानकारों का मानना है कि सेक्टर का मुख्य फोकस अभी भी प्रति व्यक्ति खपत बढ़ाने पर होना चाहिए, न कि केवल हाई-कॉस्ट वैरायटी बेचने पर। निवेशकों को अब इस पर नजर रखनी चाहिए कि क्या कंपनियां बढ़ती लागत को संभालते हुए अपने डिस्ट्रीब्यूशन को और फैला पाती हैं या नहीं।
