भारत में पालतू जानवरों की देखभाल का तरीका तेज़ी से बदल रहा है। अब लोग अपने प्यारे दोस्तों के लिए बेसिक खाने-पीने की चीज़ों से आगे बढ़कर हेल्थकेयर, डायग्नोस्टिक्स और इंश्योरेंस पर ज़्यादा ध्यान दे रहे हैं। इस बड़े बदलाव ने स्पेशलाइज्ड पेट-केयर स्टार्टअप्स के लिए कमाई का नया रास्ता खोल दिया है और वेंचर फंडिंग भी आकर्षित कर रहा है।
हेल्थकेयर मॉडल की ओर बढ़ता पेट केयर सेक्टर
भारतीय पेट केयर इंडस्ट्री इंसानों की तरह ही एक प्रोफेशनल हेल्थकेयर मॉडल की तरफ बढ़ रही है। पालतू जानवरों के मालिक अब खाने-पीने और दूसरी एक्सेसरीज़ पर होने वाले खर्च को कम करके, वैक्सीनेशन, रूटीन चेकअप, डायग्नोस्टिक्स और पेट इंश्योरेंस जैसी चीज़ों पर ज़्यादा पैसा लगा रहे हैं। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि लोग अपने पेट्स को परिवार का अहम हिस्सा मानने लगे हैं।
स्टार्टअप्स का विस्तार और कमाई
इस डिमांड को पूरा करने के लिए कंपनियां एक इंटीग्रेटेड हेल्थकेयर इकोसिस्टम बना रही हैं। बेंगलुरु की Supertails, जो ई-कॉमर्स के साथ-साथ फिजिकल वेटेरिनरी क्लिनिक भी चलाती है, ने फाइनेंशियल ईयर 25 में ₹113.3 करोड़ का रेवेन्यू दर्ज किया है। कंपनी अपने क्लिनिक्स का विस्तार कर रही है और इस साल के अंत तक 8 नए क्लिनिक खोलने की योजना बना रही है। इसी तरह, Vetic नाम की वेटेरिनरी क्लिनिक चेन ने भी इसी अवधि में ₹66.6 करोड़ का रेवेन्यू कमाया है, और उनका मुख्य फोकस प्रिवेंटिव सर्विसेज पर है।
ये कंपनियां ऐसे बिजनेस मॉडल की ओर बढ़ रही हैं जहां कम मार्जिन और ज़्यादा कंपटीशन वाले सामान बेचने के बजाय, बार-बार कमाई (recurring revenue) हो। वेलनेस सब्सक्रिप्शन और फिक्स्ड-कॉस्ट केयर प्लान ऑफर करके, ये फर्म्स कस्टमर्स के साथ एक भरोसेमंद रिश्ता बनाने की कोशिश कर रही हैं। यह मॉडल जनरल पेट रिटेल से बिल्कुल अलग है, क्योंकि यह स्पेशलाइज्ड डायग्नोस्टिक्स और वेटेरिनरी एक्सपर्टाइज पर केंद्रित है।
इन्वेस्टमेंट का रुझान और मार्केट के रिस्क
इन्वेस्टर्स की दिलचस्पी इस सेक्टर में काफी बढ़ी है। 2019 से अब तक भारतीय पेट-केयर स्टार्टअप्स ने करीब $340 मिलियन जुटाए हैं। सिर्फ 2024 में ही इन कंपनियों ने $80 मिलियन की फंडिंग हासिल की है। हालांकि, अमेरिका जैसे ग्लोबल मार्केट्स की तुलना में यह सेक्टर अभी भी शुरुआती दौर में है। पेट इंश्योरेंस सेगमेंट के 2033 तक करीब $1 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है, लेकिन इस सेक्टर के सामने अभी कई बड़ी चुनौतियां हैं।
पेट इंश्योरेंस को लेकर जागरूकता अभी भी कम है, और कई पेट मालिक इंश्योरेंस क्लेम प्रोसेस और पॉलिसी की जटिलताओं को समझने मेंstruggle करते हैं। इसके अलावा, जहां पूरे सेक्टर में काफी पैसा आया है, वहीं डायग्नोस्टिक-फोकस्ड स्टार्टअप्स को अब तक कुल फंडिंग का 1% से भी कम मिला है। यह इंफ्रास्ट्रक्चर में एक बड़ी कमी को दर्शाता है, जिसे कंपनियों को लॉन्ग-टर्म स्केल हासिल करने के लिए दूर करना होगा।
निवेशकों के लिए आगे क्या देखना ज़रूरी है?
इस स्पेस पर नज़र रखने वाले निवेशकों के लिए सबसे ज़रूरी बात यह देखना होगी कि ये स्टार्टअप्स अपनी फिजिकल एक्सपेंशन और ऑपरेशनल कॉस्ट के बीच तालमेल कैसे बिठा पाते हैं। क्लिनिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर ज़्यादा कैपिटल खर्च करना और नए लोकेशंस पर कम इस्तेमाल (low utilization) का रिस्क प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव डाल सकता है। इसके अलावा, इंडस्ट्री का विकास इस बात पर निर्भर करेगा कि ये कंपनियां मार्केट को प्रिवेंटिव केयर और इंश्योरेंस के फायदों के बारे में कितनी प्रभावी ढंग से शिक्षित कर पाती हैं। वेलनेस सब्सक्रिप्शन की स्वीकार्यता दर (adoption rate) और क्लिनिक-लेवल प्रॉफिटेबिलिटी के ट्रेंड पर नज़र रखना यह समझने के लिए ज़रूरी होगा कि क्या यह हेल्थकेयर-फर्स्ट बिजनेस मॉडल लंबे समय तक टिकाऊ वित्तीय स्वास्थ्य हासिल कर सकता है।
