भारत में कंज्यूमर कंपनियों के बीच अब मिल्क-बेस्ड (Dairy) ड्रिंक्स का चलन तेजी से बढ़ रहा है। Varun Beverages और Hindustan Unilever जैसी बड़ी कंपनियां अब कम मुनाफे वाले लिक्विड मिल्क की जगह ज्यादा मार्जिन वाले वैल्यू-एडेड डेयरी प्रोडक्ट्स पर फोकस कर रही हैं। यह गेम चेंज साबित हो सकता है, लेकिन सप्लाई चेन और रेगुलेटरी रिस्क पर नजर रखनी होगी।
क्यों बदल रहा है कंपनियां का फोकस?
भारत का रेडी-टू-ड्रिंक मार्केट तेजी से बदल रहा है और कंपनियां अब मिल्क-बेस्ड बेवरेजेज को ग्रोथ का अहम जरिया मान रही हैं। ट्रेडिशनल लिक्विड मिल्क, जिसमें मार्जिन (Profit Margin) बहुत कम होता है, उस पर निर्भर रहने के बजाय, कंपनियां अब प्रोटीन शेक, फ्लेवर्ड मिल्क और फंक्शनल डेयरी ड्रिंक्स जैसे वैल्यू-एडेड प्रोडक्ट्स की ओर बढ़ रही हैं।
इस बदलाव के पीछे दो बड़ी वजहें हैं: बदलती कंज्यूमर पसंद और हाई प्रॉफिटेबिलिटी की चाहत। कंपनियां ये समझ गई हैं कि वैल्यू-एडेड डेयरी ड्रिंक्स से वे स्टैंडर्ड लिक्विड मिल्क की तुलना में कहीं ज्यादा ऑपरेटिंग प्रॉफिट मार्जिन कमा सकती हैं। जहां लिक्विड मिल्क में मार्जिन 5% से 8% के बीच रहता है, वहीं वैल्यू-एडेड डेयरी प्रोडक्ट्स 15% से 40% तक का मार्जिन दे सकते हैं। यही वजह है कि बड़ी FMCG कंपनियां और स्पेशलाइज्ड डेयरी प्लेयर्स इस सेक्टर में उतर रहे हैं।
बड़ी कंपनियों की नई स्ट्रेटेजी
बड़ी कंपनियां अपने पोर्टफोलियो को आक्रामक तरीके से बढ़ा रही हैं। Varun Beverages ने बताया है कि उनका डेयरी सेगमेंट 40% की सालाना ग्रोथ दिखा रहा है, जो उनके ओवरऑल बिजनेस ग्रोथ से काफी आगे है। कंपनी ने हाल ही में ₹8,650.6 करोड़ का रेवेन्यू दर्ज किया है और Asahi Group Holdings के साथ पार्टनरशिप करके 'Calpis' डेयरी ड्रिंक लॉन्च कर रही है। वहीं, Hindustan Unilever ने 'Horlicks Milkshake' के साथ इस स्पेस में एंट्री की है। Parag Milk Foods और Zydus Wellness जैसी कंपनियां भी अपने 'Avvatar' और 'Max Protein' लाइन्स को एक्सपैंड कर रही हैं, ताकि हेल्थ-कॉन्शियस कंज्यूमर्स को टारगेट किया जा सके।
क्या हैं चुनौतियां?
इस ग्रोथ पोटेंशियल के बावजूद, इस सेगमेंट में कई ऑपरेशनल और रेगुलेटरी दिक्कतें हैं। प्रोडक्ट की क्वालिटी और डिस्ट्रीब्यूशन के लिए एक मजबूत कोल्ड-चेन नेटवर्क (Cold Chain Network) बनाना बहुत जरूरी है, जिसमें काफी लागत और कॉम्प्लेक्सिटी आती है। साथ ही, कंपनियों को बड़े अनऑर्गनाइज्ड डेयरी सेक्टर से निपटना पड़ता है, जिससे मिल्क सोर्सिंग में दिक्कतें आ सकती हैं।
रेगुलेटरी जांच भी एक अहम पहलू है। FSSAI ने कड़े नियम बनाए हैं, जैसे कि शुगर की तय लिमिट से ज्यादा होने पर ड्रिंक्स पर रेड वार्निंग का निशान लगाना। इससे कंपनियों को टेस्ट और हेल्थ परसेप्शन को बैलेंस करते हुए लगातार प्रोडक्ट फॉर्मूलेशन में बदलाव करना पड़ता है। इसके अलावा, इनपुट कॉस्ट में महंगाई, खासकर शुगर, PET रेजिन और रॉ मिल्क की कीमतों में बढ़ोतरी, प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव डाल सकती है, अगर कंपनियां इन बढ़ी हुई लागतों को कंज्यूमर पर ट्रांसफर न कर पाएं।
आगे चलकर, निवेशकों को यह देखना होगा कि ये कंपनियां कैसे रीजनल डिस्ट्रीब्यूशन से नेशनल स्केल तक पहुंचती हैं, खासकर जब क्विक-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स डिलीवरी के तरीके को बदल रहे हैं। रॉ मटेरियल की वोलेटिलिटी और बदलते हेल्थ-लेबलिंग नियमों के बावजूद मार्जिन बनाए रखने की कंपनियों की क्षमता, इन डेयरी एक्सपेंशन स्ट्रैटेजी की लॉन्ग-टर्म सफलता का एक महत्वपूर्ण पैमाना होगी।
