India Luxury Market: भारत में लग्ज़री का जलवा, पर ग्रोथ की राह में इंफ्रास्ट्रक्चर की बड़ी रुकावट!

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
India Luxury Market: भारत में लग्ज़री का जलवा, पर ग्रोथ की राह में इंफ्रास्ट्रक्चर की बड़ी रुकावट!
Overview

भारत का लग्ज़री मार्केट (Luxury Market) ज़बरदस्त रफ़्तार से आगे बढ़ रहा है, जिसकी मुख्य वजह देश में हाई-नेट-वर्थ इंडिविजुअल्स (HNWIs) की बढ़ती संख्या और उनका खर्च करने का तरीका है। लेकिन, अच्छी क्वालिटी वाले रिटेल इंफ्रास्ट्रक्चर (Retail Infrastructure) की भारी कमी और आर्थिक असमानता के चलते इस ग्रोथ पर ब्रेक लगता दिख रहा है।

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ग्रोथ पर लगी रोक! क्यों नहीं बढ़ पा रहा लग्ज़री मार्केट?

देश में हाई-नेट-वर्थ इंडिविजुअल्स (HNWIs) की तादाद तेजी से बढ़ रही है। आंकड़े बताते हैं कि 2021 और 2025 के बीच ₹8.5 करोड़ से ज्यादा की नेट वर्थ वाले परिवारों की संख्या लगभग दोगुनी होकर करीब 8.71 लाख तक पहुंच गई है। एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि 2034 तक HNWIs और अल्ट्रा-हाई-नेट-वर्थ इंडिविजुअल्स (UHNWIs) की ग्रोथ 11-15% सालाना की दर से बढ़ती रहेगी। इसी वजह से लग्ज़री फैशन, एक्सेसरीज़ और प्रीमियम कारों की डिमांड भी आसमान छू रही है।

बड़े प्लेयर्स जैसे रिलायंस ब्रांड्स लिमिटेड (RBL) और आदित्य बिड़ला फैशन एंड रिटेल (ABFRL) इस मौके का फायदा उठाने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। ये कंपनियां 85 से ज्यादा ग्लोबल ब्रांड्स के साथ पार्टनरशिप कर रही हैं और कई इंडियन डिजाइनर्स में भी हिस्सेदारी खरीद रही हैं। इतना ही नहीं, 2024 में करीब 30 नए ग्लोबल लग्ज़री ब्रांड्स के भारत आने की खबर है, जो दूसरे बाजारों के धीमे पड़ने के बीच भारत की अहमियत को दिखाती है।

इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी सबसे बड़ी रुकावट

हालांकि, इतनी ज़बरदस्त डिमांड के बावजूद, लग्ज़री रिटेल के लिए फिजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर एक बड़ी रुकावट बना हुआ है। भारत में अच्छी क्वालिटी वाले 'ग्रेड-ए' रिटेल स्पेस की भारी कमी है। अनुमान है कि यहां प्रति व्यक्ति केवल 0.07 वर्ग फुट का रिटेल स्पेस उपलब्ध है, जो थाईलैंड जैसे देशों के मुकाबले 30 गुना से भी कम है। प्राइम रिटेल लोकेशंस मिलना लगभग नामुमकिन सा हो गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, टॉप-टियर ब्रांड्स के आने की चाहत के बावजूद, क्वालिटी स्पेस की अवेलेबिलिटी शून्य है। देश में फिलहाल सिर्फ तीन ही ऐसे मॉल हैं जिन्हें 'रियल लग्ज़री मॉल' कहा जा सकता है। इस कमी की वजह से किराए आसमान छू रहे हैं और ब्रांड्स के लिए वो ग्लोबल स्टैंडर्ड वाले लग्ज़री एक्सपीरियंस देना मुश्किल हो रहा है, जिसकी उम्मीद ग्राहक करते हैं।

'के-शेप' इकोनॉमी और बढ़ती दूरी

यह लग्ज़री मार्केट की ग्रोथ स्टोरी असल में एक 'आभासी' (illusion) साबित हो सकती है, क्योंकि यह एक बड़े कंज्यूमर बेस के बजाय सिर्फ कुछ खास अमीर तबके पर टिकी है। भले ही मिलियनेयर्स की संख्या बढ़ रही है, लेकिन हालिया एनालिसिस बताते हैं कि अफोर्डेबिलिटी कंसर्न्स (खरीदने की क्षमता की चिंता) के चलते एस्पिरेशनल कंज्यूमर्स (जो खरीदना चाहते हैं पर खरीद नहीं पा रहे) अपने खर्चों में कटौती कर रहे हैं। ऐसे में, टॉप-टियर क्लाइंट्स ही मार्केट को चला रहे हैं। यह एक 'के-शेप' इकोनॉमी की ओर इशारा करता है, जहां दौलत बहुत असमान रूप से बंटी हुई है और इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कंजम्पशन पोटेंशियल से काफी पीछे चल रहा है। इसके अलावा, भारत में हाई इम्पोर्ट ड्यूटी (आयात शुल्क) और कामकाज से जुड़ी कई मुश्किलें भी विदेशी ब्रांड्स के लिए बड़े पैमाने पर मार्केट में घुसना चुनौतीपूर्ण बनाती हैं। सीमित हाई-क्वालिटी रिटेल स्पेस का मतलब है कि ब्रांड्स को, भले ही वे स्टोर के फॉर्मेट से समझौता करने को तैयार हों, फिर भी विस्तार के लिए बहुत कम विकल्प मिलते हैं।

आगे का रास्ता क्या?

एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारत का लग्ज़री मार्केट 2030 तक $85-90 बिलियन तक पहुंच सकता है, जो कि एक बड़ा पोटेंशियल दिखाता है। लेकिन, इस भविष्य को हकीकत में बदलने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी को दूर करना बेहद जरूरी होगा। जो ब्रांड्स सफल होंगे, वे वही होंगे जो लोकल रिटेल की जटिलताओं को समझकर, प्राइम लोकेशंस पर 'एक्सपीरिएंशियल रिटेल' (अनुभव देने वाले रिटेल) पर फोकस करेंगे और खास तौर पर भारत के अमीर वर्ग को टारगेट करेंगे, बजाय इसके कि वे बड़े पैमाने पर मार्केट पेनिट्रेशन की कोशिश करें। टियर-2 शहरों में विस्तार के लिए खास स्ट्रेटेजी और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट की जरूरत होगी।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.