Go Zero Drinks पर लागत का वार! मीठे की महंगाई ने कंपनियों के मुनाफे पर कसा शिकंजा

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AuthorAditya Rao|Published at:
Go Zero Drinks पर लागत का वार! मीठे की महंगाई ने कंपनियों के मुनाफे पर कसा शिकंजा
Overview

भारत में 'गो जीरो' यानी शुगर-फ्री (Sugar-Free) ड्रिंक्स का बाजार तेजी से बढ़ रहा है, क्योंकि लोग सेहतमंद विकल्प चुन रहे हैं। लेकिन, इस बूम के बीच कंपनियों के लिए मुश्किलें खड़ी हो गई हैं। स्टीविया (Stevia) और मॉन्क फ्रूट (Monk Fruit) जैसे नेचुरल स्वीटनर्स की कीमतें बढ़ने और मार्केट में कड़े प्राइस वॉर (Price War) के चलते कंपनियों के मुनाफे (Profit) पर भारी दबाव दिख रहा है।

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मीठा, पर महंगा: 'गो जीरो' पर प्रॉफिट का संकट?

सेहत के प्रति बढ़ती जागरूकता के चलते भारत में जीरो-शुगर (Zero-Sugar) वाले बेवरेजेज की डिमांड तेजी से बढ़ी है। शुगर-फ्री मिल्क शेक, सोडा और स्मूदी की मांग आसमान छू रही है। लेकिन, इस ट्रेंड को बनाए रखना कंपनियों के लिए महंगा साबित हो रहा है।

मुख्य वजहें ये हैं:

  • स्वीटनर की बढ़ती कीमतें: कंपनियां शुगर के बजाय स्टीविया और मॉन्क फ्रूट जैसे हाई-इंटेंसिटी नेचुरल स्वीटनर्स का इस्तेमाल कर रही हैं। ये चीनी से कई गुना मीठे होते हैं, लेकिन इनकी प्रोडक्शन कॉस्ट 30% तक ज्यादा हो सकती है।
  • ज़बरदस्त प्राइस वॉर: मार्केट में कड़ा मुकाबला है। Coca-Cola और PepsiCo जैसी बड़ी कंपनियां अपने जीरो-शुगर वेरिएंट्स के लिए ₹10 वाले पैक लॉन्च कर रही हैं ताकि मार्केट शेयर छीन सकें और Reliance के Campa Cola जैसे प्रतिद्वंद्वियों को टक्कर दे सकें।
  • फंक्शनल ड्रिंक्स की ओर शिफ्ट: अब मार्केट सिर्फ शुगर-फ्री तक सीमित नहीं है, बल्कि विटामिन, प्रोबायोटिक्स (Probiotics) और एडैप्टोजेंस (Adaptogens) जैसे फंक्शनल फायदे (Functional Benefits) वाले ड्रिंक्स की ओर बढ़ रहा है। ऐसे प्रोडक्ट्स की R&D और मार्केटिंग में ज़्यादा खर्च आता है।

मार्केट लीडर्स की क्या है रणनीति?

  • Coca-Cola India: इनके जीरो-शुगर पोर्टफोलियो की बिक्री डबल-डिजिट में है, और Diet Coke की बिक्री 2025 में साल-दर-साल डबल हो गई है। हालांकि, यह वॉल्यूम ग्रोथ मार्जिन पर असर डाल सकती है।
  • PepsiCo (Varun Beverages): नो-शुगर और मिड-शुगर ड्रिंक्स इनकी सेल्स वॉल्यूम का करीब 63% हैं। कंपनी 2030 तक अपने पोर्टफोलियो को लगभग 100% नो-शुगर बनाने का लक्ष्य लेकर चल रही है।
  • Dabur India: कंपनी के P/E रेशियो (Price-to-Earnings Ratio) करीब 45-58 है। Dabur अपने 'Real Activ' नो-एडेड-शुगर रेंज की प्राइसिंग को मैनेज करने की कोशिश कर रही है। कंपनी प्रीमियम हेल्थ-बेस्ड प्रोडक्ट्स जैसे जीरो-शुगर ड्रिंक्स और हेल्थ गमीज़ पर फोकस कर रही है।
  • ITC: जिनका मार्केट कैप करीब ₹3.85 ट्रिलियन है, वे सीधे तौर पर शुगर-फ्री बेवरेजेज सेगमेंट पर कम केंद्रित दिखते हैं, हालांकि वे FMCG सेक्टर में सक्रिय हैं।

क्या है आगे का रास्ता?

"गो जीरो" सेगमेंट का भारतीय बाजार CY24 में लगभग ₹700-750 करोड़ का है और नॉन-अल्कोहलिक सेक्टर का 10% हिस्सा रखता है। इसमें डबल-डिजिट ग्रोथ देखी जा रही है। Coca-Cola का इस सेगमेंट में 71% मार्केट शेयर है।

हालांकि, US की ओर से नेचुरल स्वीटनर्स पर संभावित टैरिफ (Tariff) कीमतों को और बढ़ा सकते हैं। दूसरी ओर, कंज्यूमर की हेल्थ के लिए प्रीमियम चुकाने की इच्छा आर्थिक मंदी (Economic Headwinds) के चलते कम हो सकती है। Dabur India ने 2018 से अपने 'Real' जूस लाइन में एडेड शुगर को 20% से ज़्यादा कम किया है, जो लगातार बदलती स्वास्थ्य मानकों के हिसाब से ढलने का एक उदाहरण है। इन लगातार री-फॉर्मूलेशन (Re-formulation) में काफी खर्च आता है।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.