भारत की अर्थव्यवस्था इस समय एक दोहरी तस्वीर पेश कर रही है। एक तरफ जहाँ GDP ग्रोथ ज़बरदस्त है, वहीं दूसरी तरफ कंज्यूमर खर्च में धीमी गति और AI जैसे अहम क्षेत्रों में टैलेंट की भारी कमी जैसी चुनौतियाँ भी सामने आ रही हैं।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत का कंज्यूमर मार्केट 2030 तक 4.3 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है। युवा आबादी की बढ़ती डिस्पोजेबल इनकम और प्रीमियम, वैल्यू-बेस्ड तथा लोकल गुड्स की मांग इसमें अहम भूमिका निभा रही है। FMCG सेक्टर अकेले 2025 तक 220 बिलियन डॉलर तक पहुँच सकता है।
लेकिन, इस चमक के पीछे एक चिंताजनक तस्वीर भी है। फाइनेंशियल ईयर 2023-24 में प्राइवेट कंजम्पशन एक्सपेंडिचर (PFCE) की ग्रोथ घटकर महज़ 4% रह गई, जो GDP ग्रोथ से काफी कम है। इसका मतलब है कि लोग, भले ही इकोनॉमी बढ़ रही है, लेकिन खाना, कपड़े और ट्रांसपोर्ट जैसी ज़रूरी चीजों पर भी पहले से ज़्यादा सोच-समझकर खर्च कर रहे हैं। शहरी मांग थोड़ी धीमी पड़ी है, जबकि ग्रामीण मांग में सुधार दिख रहा है।
आर्थिक बदलावों के साथ-साथ, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के क्षेत्र में एक बड़ा संकट मंडरा रहा है। भारत में 40% से ज़्यादा IT और गिग वर्कर्स AI टूल्स का इस्तेमाल कर रहे हैं, और 62% कर्मचारियों का मानना है कि AI स्किल्स पारंपरिक अनुभव से ज़्यादा ज़रूरी हो जाएँगे। लगभग 90% एम्प्लॉयर्स AI-स्किल्ड कैंडिडेट्स को प्राथमिकता देते हैं, लेकिन 79% कंपनियाँ योग्य टैलेंट न मिलने की वजह से हायरिंग में संघर्ष कर रही हैं। अनुमान है कि 2027 तक भारत को 1 मिलियन से ज़्यादा AI प्रोफेशनल्स की कमी का सामना करना पड़ सकता है।
यह टैलेंट की कमी भविष्य की ग्रोथ के लिए ज़रूरी टेक्नोलॉजी को अपनाने की रफ्तार को धीमा कर सकती है। इसके अलावा, ब्रांड्स के लिए भी चुनौतियाँ कम नहीं हैं, चाहे वो ग्लोबल मार्केट में विस्तार करना चाहें या फिर डोमेस्टिक लेवल पर SMEs को बड़ी कंपनियों से मुकाबला करना हो। मार्केट का अत्यधिक सेगमेंटेशन और रेगुलेटरी मुद्दे भी इन मुश्किलें बढ़ाते हैं।
ऐसे में, भारत की भविष्य की ग्रोथ काफी हद तक इन चुनौतियों से निपटने की क्षमता पर निर्भर करेगी। लीडर्स को अनिश्चितता के बीच लचीलापन दिखाना होगा, लगातार सीखने पर ज़ोर देना होगा और बदलती टेक्नोलॉजी के साथ तालमेल बिठाना होगा।