भारत का डेयरी सेक्टर, जिसका कुल उत्पादन **247 मिलियन टन** से ज्यादा है, इन दिनों कोल्ड चेन की कमियों और बर्बादी के कारण मुनाफे में भारी गिरावट देख रहा है। FSSAI के कड़े नियमों के बाद अब कंपनियों पर बेहतर लॉजिस्टिक्स और इन्वेंट्री ट्रैकिंग के लिए निवेश का दबाव बढ़ गया है।
भारत की डेयरी इंडस्ट्री एक ऐसी चुनौती से जूझ रही है जो सीधे कंपनी के मुनाफे पर चोट कर रही है। फाइनेंशियल ईयर 2024-25 में देश का कुल उत्पादन 247.87 मिलियन टन रहा, लेकिन कोल्ड चेन में खामियों के चलते बड़ा हिस्सा बर्बाद हो जाता है। ट्रांसपोर्टेशन के दौरान तापमान बढ़ने से डेयरी प्रोडक्ट्स की शेल्फ लाइफ घट जाती है, जिससे कंपनियों को मजबूरी में डिस्काउंट देना पड़ता है और मुनाफा घटता है।
रेगुलेटरी सख्ती और चुनौतियां
अब FSSAI (भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण) ने पनीर और खोया जैसे सेंसिटिव प्रोडक्ट्स के लिए सख्त तापमान नियमों की गाइडलाइंस जारी कर दी हैं। यह नियम अब डार्क स्टोर्स और क्विक-कॉमर्स हब्स पर भी लागू होंगे। इसका मतलब है कि कंपनियों को इंफ्रास्ट्रक्चर पर भारी निवेश करना होगा, जो शॉर्ट टर्म में उनके ऑपरेटिंग मार्जिन पर दबाव डाल सकता है।
कैसे बदलेगी रणनीति?
क्विक-कॉमर्स के दौर में लास्ट-माइल डिलीवरी के दौरान दही और पनीर जैसे प्रोडक्ट्स को फ्रेश रखना एक बड़ी तकनीकी चुनौती है। अब कंपनियां मैन्युअल प्रोसेस को छोड़ 'डेटा-ड्रिवन इन्वेंट्री मैनेजमेंट' अपना रही हैं। इसमें 'फर्स्ट-एक्सपायरी-फर्स्ट-आउट' (FEFO) प्रोटोकॉल को अनिवार्य किया जा रहा है। आने वाले समय में जो कंपनियां अपने सप्लाई चेन में निवेश कर पाएंगी और लिक्विड दूध को घी या मिल्क पाउडर जैसे स्टेबल प्रोडक्ट्स में बदल सकेंगी, वही बाजार में अपनी जगह बनाए रखेंगी। निवेशकों को अब इन कंपनियों के सप्लाई चेन एक्सपेंडिचर पर खास नजर रखने की जरूरत है।
