Dairy Industry: वॉल्यूम का दौर खत्म, अब मार्जिन की जंग! क्या बदल रही है कंपनियों की रणनीति?

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
Dairy Industry: वॉल्यूम का दौर खत्म, अब मार्जिन की जंग! क्या बदल रही है कंपनियों की रणनीति?

भारत का डेयरी सेक्टर अब लिक्विड दूध के बजाय दही, पनीर और आइसक्रीम जैसे हाई-वैल्यू प्रोडक्ट्स पर फोकस कर रहा है। कच्चा दूध महंगा होने के कारण कंपनियों का पूरा जोर अब प्रॉफिबिलिटी बढ़ाने पर है।

भारत दुनिया में दूध उत्पादन के मामले में नंबर वन है, लेकिन अब डेयरी कंपनियों के लिए सिर्फ ज्यादा दूध बेचना ही मुनाफे की गारंटी नहीं रहा। इंडस्ट्री अब एक ऐसे मोड़ पर है जहां उन्हें अपना फोकस लिक्विड मिल्क से हटाकर 'वैल्यू-एडेड प्रोडक्ट्स' पर लाना पड़ रहा है। यह बदलाव कच्चे दूध की बढ़ती लागत (procurement costs) के बीच कंपनियों के मार्जिन को सुरक्षित रखने के लिए बेहद जरूरी हो गया है।

क्यों जरूरी है यह बदलाव?

सालों तक डेयरी बिजनेस सिर्फ दूध इकट्ठा करने और उसे बेचने पर टिका था। लेकिन इस मॉडल में रिस्क ज्यादा है, क्योंकि चारे की महंगाई और लेबर कॉस्ट के चलते कच्चा दूध महंगा हो जाता है। कंपनियां अक्सर दोतरफा दबाव में रहती हैं—एक तरफ लागत बढ़ती है, दूसरी तरफ रिटेल ग्राहकों को दूध सस्ता चाहिए। अब कंपनियां दही, पनीर, चीज और आइसक्रीम जैसे प्रोडक्ट्स पर ध्यान दे रही हैं, क्योंकि इनकी शेल्फ-लाइफ ज्यादा होती है और ब्रांडेड होने के कारण कंपनी अच्छा मुनाफा कमा सकती है।

इन्फ्रास्ट्रक्चर की चुनौती

वैल्यू-एडेड प्रोडक्ट्स की राह आसान नहीं है। इनके लिए कोल्ड चेन इन्फ्रास्ट्रक्चर पर भारी निवेश की जरूरत होती है। लिक्विड दूध तो आसानी से डिस्ट्रीब्यूट हो जाता है, लेकिन प्रीमियम प्रोडक्ट्स को फैक्ट्री से दुकान तक ठंडा रखना एक बड़ी चुनौती और महंगा काम है। इससे शॉर्ट टर्म में कंपनियों का कैश फ्लो और कर्ज पर असर पड़ सकता है। साथ ही, भारतीय मार्केट का बड़ा हिस्सा अभी भी असंगठित (unorganised) है, जो बड़ी कंपनियों की प्राइसिंग पावर को सीमित करता है।

निवेशकों के लिए काम की बात (Investor Monitorables)

जो निवेशक डेयरी शेयरों पर नजर रख रहे हैं, उन्हें यह देखना चाहिए कि कंपनी का रेवेन्यू मिक्स कैसा है। अगर कंपनी का बड़ा हिस्सा वैल्यू-एडेड प्रोडक्ट्स से आ रहा है, तो लॉन्ग टर्म में उनके मार्जिन स्थिर रहने की उम्मीद ज्यादा है। इसके अलावा, कंपनी अपनी प्रोक्योरमेंट एफिशिएंसी को कैसे मैनेज कर रही है, यह भी ट्रैक करें। जो कंपनियां बिचौलियों के बजाय सीधे किसानों से दूध ले रही हैं, वे क्वालिटी और कॉस्ट कंट्रोल में ज्यादा बेहतर साबित हो रही हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.