भारत का ₹1.5 लाख करोड़ का मिठाई और नमकीन (Sweets and Savory Snacks) सेक्टर ग्लोबल मार्केट में धूम मचा रहा है। एक्सपोर्ट पिछले कुछ सालों में **10%** सालाना से भी ज्यादा की रफ्तार से बढ़ रहा है। बेहतर पैकेजिंग और शेल्फ लाइफ (Shelf Life) की वजह से भारतीय ब्रांड्स यूके, यूरोप और साउथईस्ट एशिया जैसे बाजारों में अपनी पैठ बना रहे हैं। बड़े मैन्युफैक्चरर्स इस ग्लोबल विस्तार को भुनाने के लिए खास प्रोडक्शन यूनिट्स लगा रहे हैं।
टेक्नोलॉजी के दम पर ग्लोबल पहुंच
अब तक भारतीय मिठाईयां सिर्फ देश या विदेश में बसे भारतीयों तक ही सीमित थीं, लेकिन अब ये ग्लोबल एक्सपोर्ट कमोडिटी बनती जा रही हैं। पिछले कुछ सालों में इस सेक्टर का एक्सपोर्ट 10% सालाना से भी ज्यादा की दर से बढ़ रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह हैं गुलाब जामुन, रसगुल्ला और सोन पापड़ी जैसे पारंपरिक प्रोडक्ट्स की बढ़ती पॉपुलैरिटी और साथ ही, इनकी पैकेजिंग और शेल्फ लाइफ (Shelf Life) में आया जबरदस्त सुधार।
पुरानी टेक्नोलॉजी के चलते भारतीय मिठाइयों की शेल्फ लाइफ कम थी, जिससे इनका एक्सपोर्ट सिर्फ उन्हीं देशों तक सीमित था जहां भारतीय मूल के लोग बड़ी संख्या में रहते हैं। लेकिन अब फूड टेक्नोलॉजी में हुए नए आविष्कारों की मदद से मैन्युफैक्चरर्स इनकी क्वालिटी को बरकरार रखते हुए शेल्फ लाइफ को काफी बढ़ा पाए हैं। इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का कहना है कि इस तकनीकी क्रांति की वजह से ही बड़े ब्रांड्स अब दुनिया के अलग-अलग कोनों में अपने प्रोडक्ट्स पहुंचा पा रहे हैं। Haldiram's जैसी कंपनियां अमेरिका, कनाडा, जापान और सिंगापुर जैसे कॉम्पिटिटिव मार्केट में सप्लाई चेन को मजबूत कर रही हैं।
विदेश की मांग पूरी करने के लिए प्रोडक्शन बढ़ाना
अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती मांग को देखते हुए, मैन्युफैक्चरर्स एक्सपोर्ट-स्पेसिफिक इंफ्रास्ट्रक्चर (Export-Specific Infrastructure) में भारी निवेश कर रहे हैं। Dadu Mithai Vatika जैसी कंपनियां एक्सपोर्ट के लिए खास किचन (Export Kitchens) लगा रही हैं। ये यूनिट्स विदेशी खरीदारों की क्वालिटी और वॉल्यूम की जरूरतों को पूरा करने के लिए डिज़ाइन की गई हैं। इसके अलावा, कंपनियां चॉकलेट-बेस्ड मिठाइयां और ड्राई-फ्रूट वाले स्नैक्स जैसे नए प्रोडक्ट्स भी लॉन्च कर रही हैं, जिनकी मांग गल्फ देशों, यूरोप और अमेरिका में तेजी से बढ़ रही है।
निवेशक इन बातों पर रखें नज़र
एक्सपोर्ट में यह ग्रोथ भले ही नए रेवेन्यू के मौके ला रही हो, लेकिन निवेशकों को इसके प्रॉफिट मार्जिन (Profit Margin) पर पड़ने वाले असर पर भी नजर रखनी चाहिए। एक्सपोर्ट के लिए लॉजिस्टिक्स (Logistics), स्पेशल पैकेजिंग और अलग-अलग देशों के फूड सेफ्टी रेगुलेशंस (Food Safety Regulations) का पालन करने में ज्यादा खर्च आता है। कंपनियाँ जैसे-जैसे एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने के लिए कैपिटल स्पेंडिंग (Capital Spending) बढ़ा रही हैं, वैसे-वैसे यह देखना अहम होगा कि विदेशी बाजारों में प्राइसिंग पावर (Pricing Power) बनाए रखकर वे कितना रिटर्न कमा पाती हैं।
इसके अलावा, यह इंडस्ट्री खाने के तेल, चीनी और ड्राई फ्रूट्स जैसे कच्चे माल की कीमतों के उतार-चढ़ाव के प्रति भी संवेदनशील है। इन कमोडिटी की कीमतों में होने वाले बदलावों का घरेलू और अंतरराष्ट्रीय, दोनों बिक्री पर असर पड़ सकता है। निवेशक आने वाली अर्निंग रिपोर्ट्स में मैनेजमेंट से इस बात पर कमेंट्री सुनना चाहेंगे कि टोटल प्रोडक्ट मिक्स में एक्सपोर्ट रेवेन्यू का कितना हिस्सा है और क्या ये अंतरराष्ट्रीय वेंचर्स डोमेस्टिक ऑपरेशंस के मुकाबले बेहतर मार्जिन दे पा रहे हैं।
