मीठे स्नैक्स में इनोवेशन पीछे, प्रोटीन की मांग बढ़ी
उपभोक्ताओं की सेहतमंद विकल्पों में बढ़ती दिलचस्पी के बावजूद, भारत की प्रमुख स्नैक निर्माता कंपनियां कम या बिल्कुल चीनी रहित (low-sugar) प्रोडक्ट्स विकसित करने और लॉन्च करने के लिए संघर्ष कर रही हैं। पिछले फाइनेंशियल ईयर (जो मार्च 31 को खत्म हुआ) में, चॉकलेट, कन्फेक्शनरी, बिस्किट और स्नैक बार जैसे सेगमेंट्स में लॉन्च हुए कुल नए प्रोडक्ट्स में से केवल 0.9% ही ऐसे थे जिनमें चीनी कम थी। यह आंकड़ा पिछले साल 1.1% से थोड़ा कम हुआ है, हालांकि 2022 में यह सिर्फ 0.1% था।
इसके विपरीत, उपभोक्ताओं की मांग काफी अलग है। रिपोर्ट्स के अनुसार, लगभग एक-तिहाई किशोर (teenagers) और उनके माता-पिता हाई-प्रोटीन स्नैक्स की तलाश में हैं, जबकि चौथाई लोग कम चीनी वाले विकल्पों को प्राथमिकता दे रहे हैं। विशेष रूप से शहरी और ऑनलाइन बिक्री में, 'शुगर-फ्री' और 'नो-एडेड-शुगर' वाले प्रोडक्ट्स मुख्य कैटगरी की तुलना में 30-40% तेज गति से बढ़ रहे हैं, भले ही इनकी शुरुआत एक छोटे बेस से हुई हो।
प्रोटीन और फंक्शनल फूड्स ले रहे हैं बढ़त
बाजार अब सिर्फ चीनी कम करने से आगे बढ़कर 'फंक्शनल न्यूट्रिशन' (functional nutrition) की ओर बढ़ रहा है। फिटनेस ट्रेंड्स और महामारी के बाद सेहत पर बढ़े फोकस के चलते प्रोटीन अब एक मुख्य दावा (claim) बन गया है। कंपनियां अब इस आधार पर अलग दिखेंगी कि वे प्रोटीन कैसे प्रदान करती हैं, उसकी गुणवत्ता क्या है और साथ में फाइबर जैसी चीजें भी शामिल हैं या नहीं। उपभोक्ता एनर्जी, इम्यूनिटी, नींद और मूड को बेहतर बनाने वाले फंक्शनल फूड्स और ड्रिंक्स में भी अधिक रुचि दिखा रहे हैं। 'बेटर-फॉर-यू' (better-for-you) यानी 'आपके लिए बेहतर' जैसे विकल्पों की यह बढ़ती मांग स्नैकिंग के परिदृश्य को बदल रही है, जहां अब केवल स्वाद और कीमत से आगे बढ़कर सेहत के चुनाव और जीवनशैली की पहचान को भी महत्व दिया जा रहा है।
प्रमुख कंपनियां और नई चुनौतियां
Britannia Industries (मार्केट कैप ₹1.31-1.41 ट्रिलियन, P/E 52-58), Nestle India (मार्केट कैप ₹2.33 ट्रिलियन, P/E 68-70), और ITC (मार्केट कैप ₹3.69 ट्रिलियन, P/E 10-18) जैसी बड़ी कंपनियां और Parle Products (FY25 रेवेन्यू ₹18,200 करोड़) जैसे स्थापित खिलाड़ी इस बदलते बाजार में अपनी राह बनाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन इन कंपनियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है - कम चीनी वाले प्रोडक्ट को स्वाद से समझौता किए बिना या कीमत को बहुत ज्यादा बढ़ाए बिना तैयार करना। भारत जैसे मूल्य-संवेदनशील (price-sensitive) बाजार में, जहां ग्राहक अक्सर वैल्यू को प्राथमिकता देते हैं, यह एक बड़ी रुकावट है। कई उपभोक्ता चीनी-मुक्त विकल्पों पर स्विच करने के बजाय मीठे उत्पादों की कुल खपत ही कम कर रहे हैं। ऊपर से, खाने के तेल जैसे कच्चे माल की बढ़ती कीमतों के चलते पहले ही पैकों का साइज छोटा करना पड़ा है, जिससे affordability प्रभावित हुई है। बाजार बहुत प्रतिस्पर्धी (competitive) है, जिसमें क्षेत्रीय खिलाड़ी और अनौपचारिक क्षेत्र (informal sector) सस्ते विकल्प पेश कर रहे हैं, जो बड़ी फर्मों के मार्जिन और इनोवेशन बजट पर दबाव बना रहे हैं। हालांकि, हेल्दी ऑप्शन पर 17-22% तक प्रीमियम चार्ज किया जा सकता है, लेकिन यह तभी संभव है जब उपभोक्ता को स्वाद और प्रभावशीलता स्पष्ट दिखे, खासकर जब चीनी कम करने से स्वाद या लागत बिगड़ जाए।
भविष्य के रुझान: फंक्शनल न्यूट्रिशन पर फोकस
इंडस्ट्री के अनुमान बताते हैं कि फंक्शनल फायदों, खासकर प्रोटीन, की मांग स्नैकिंग सेक्टर को आगे भी दिशा देती रहेगी। जिन ब्रांड्स में सामग्री (ingredient) की जानकारी स्पष्ट होगी और उत्पाद की प्रभावशीलता (effectiveness) दिखेगी, वे ग्राहकों को आकर्षित करेंगे। 'बेटर-फॉर-यू' फॉर्मेट्स और फंक्शनल फूड्स की ओर एक संरचनात्मक बदलाव (structural shift) अपेक्षित है। अब कंपनियों को सेहत के दावों को अच्छे स्वाद, सुविधा और किफायती दामों के साथ संतुलित करना होगा। बाजार की दिशा यही दर्शाती है कि केवल चीनी कम करने पर नहीं, बल्कि पूर्ण पोषण (complete nutrition) पर केंद्रित इनोवेशन भारतीय उपभोक्ताओं, खासकर युवाओं के स्वाद को जीतने के लिए महत्वपूर्ण होगा।