त्योहारी सीजन में भारतीय रिटेल कंपनियां अपनी रणनीति बदल रही हैं। भारी डिस्काउंट देने के बजाय, अब कंपनियां 'नो-कॉस्ट EMI' और एक्सचेंज जैसे फाइनेंसिंग टूल्स पर दांव लगा रही हैं ताकि कच्चे माल की बढ़ती लागत के बीच प्रॉफिट मार्जिन को सुरक्षित रखा जा सके।
भारतीय रिटेल बाजार इस फेस्टिव सीजन अपनी कार्यप्रणाली में बड़ा बदलाव देख रहा है। इनपुट कॉस्ट और कच्चे माल की कीमतों में भारी उछाल के चलते कंपनियों के लिए ग्राहकों को भारी-भरकम डिस्काउंट देना अब मुनाफे के लिहाज से महंगा साबित हो रहा है। ऐसे में इलेक्ट्रॉनिक्स से लेकर ज्वैलरी सेक्टर तक, अब कंपनियां 'फाइनेंसिंग का खेल' खेल रही हैं।
इलेक्ट्रॉनिक्स में 'प्रीमियम' पर फोकस
टीवी और होम अप्लायंस बनाने वाली कंपनियां अब कम दाम के बजाय 'प्रीमियम प्रोडक्ट्स' पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं। ब्रांड्स की रणनीति साफ है—ग्राहक को महंगा प्रोडक्ट दिखाओ और उसे नो-कॉस्ट EMI के जरिए खरीदने का आसान रास्ता दिखाओ। इससे ग्राहकों को भी बड़ी रकम एक बार में नहीं देनी पड़ती और कंपनियों का मार्जिन भी बचा रहता है।
ज्वैलरी सेक्टर का नया दांव
सोने की रिकॉर्ड कीमतों के बीच, ज्वैलरी ब्रांड्स जैसे Malabar Gold & Diamonds ने पुराने सोने के एक्सचेंज प्रोग्राम्स पर फोकस बढ़ा दिया है। इससे ग्राहक को नई खरीदारी के लिए ज्यादा कैश नहीं देना पड़ता। वहीं CaratLane और BlueStone Jewellery जैसी कंपनियां अपने डिजाइन और प्राइसिंग टियर्स को बदल रही हैं, ताकि ग्राहकों को बिना डिस्काउंट दिए भी आकर्षित किया जा सके।
निवेशकों के लिए जोखिम और अवसर
यह बदलाव निवेशकों के लिए एक दोधारी तलवार है। अगर यह रणनीति सफल रहती है, तो कंपनियों का नेट प्रॉफिट बना रहेगा। लेकिन, इसके साथ 'सबवेंशन कॉस्ट' (Subvention Costs) का जोखिम जुड़ा है। ये वो खर्च है जो कंपनियां बैंक को ब्याज चुकाने के लिए देती हैं। अगर ये लागत बढ़ती है, तो आने वाले समय में मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है।
निवेशकों को अब कंपनियों की 'वैल्यू ग्रोथ' बनाम 'वॉल्यूम ग्रोथ' पर नजर रखनी चाहिए। अगर सेल की कुल वैल्यू बढ़ रही है लेकिन वॉल्यूम स्थिर है, तो समझिये कि प्रीमियम बनाने की यह रणनीति सफल हो रही है।
