देशभर की रेस्टोरेंट चेन ने बढ़ती महंगाई और सख्त नियमों के चलते खाने की कीमतों में **15%** तक का इजाफा कर दिया है। अब निवेशकों की नजरें इस पर टिकी हैं कि क्या फेस्टिव सीजन में ग्राहक महंगे खाने के साथ बने रहेंगे या डिमांड में गिरावट आएगी।
सितंबर 2026 में रिटेल फूड इन्फ्लेशन के 7.74% पर पहुंचने के बाद भारतीय रेस्टोरेंट सेक्टर एक बड़े संकट से गुजर रहा है। एडिबल ऑयल, प्याज और चीनी जैसे जरूरी सामान महंगे होने के कारण मुनाफे को बचाए रखने के लिए कई बड़ी फूड चेन्स ने मेन्यू की कीमतों में 10% से 15% तक बढ़ोतरी की है। इतना ही नहीं, कंपनियां 'मेन्यू इंजीनियरिंग' का सहारा ले रही हैं, जिसके तहत महंगे डिशेज को हटाकर पोर्शन साइज को छोटा किया जा रहा है ताकि कॉस्ट को मैनेज किया जा सके।
सख्त नियम और बढ़ता खर्च
महंगाई के अलावा, FSSAI और महाराष्ट्र FDA जैसे निकायों द्वारा किए जा रहे कड़े ऑडिट ने भी कंपनियों की टेंशन बढ़ा दी है। अब रेस्टोरेंट चेन्स को लैब टेस्टिंग और ऑयल रिप्लेसमेंट जैसे नियमों पर ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है। Jubilant FoodWorks, Westlife Foodworld, Devyani International और Sapphire Foods जैसी बड़ी QSR कंपनियों के लिए ये खर्च अब परमानेंट बोझ बनते जा रहे हैं, जिन्हें ग्राहकों पर डालना मजबूरी हो गई है।
निवेशकों के लिए क्या है खतरा?
मार्केट एक्सपर्ट्स अब 'वॉल्यूम फैटीग' (Volume Fatigue) को लेकर सतर्क हैं। डर इस बात का है कि कहीं ज्यादा कीमतों के कारण ग्राहक लोकल ईटरीज़ या घर के खाने का विकल्प न चुन लें। वहीं, डिलीवरी एग्रीगेटर्स का भारी कमीशन भी नेट प्रॉफिट के लिए बड़ी बाधा बना हुआ है। अब निवेशकों को कंपनियों के आने वाले तिमाही नतीजों (Quarterly Results) पर कड़ी नजर रखनी होगी, ताकि यह पता चल सके कि कंपनियां बढ़ती लागत और गिरती डिमांड के बीच बैलेंस कैसे बना पा रही हैं।
