Restaurant Chains Funding: अब ग्रोथ नहीं, Profit का दौर! कई बड़े ब्रांड्स को पूंजी जुटाने में पसीने

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AuthorMehul Desai|Published at:
Restaurant Chains Funding: अब ग्रोथ नहीं, Profit का दौर! कई बड़े ब्रांड्स को पूंजी जुटाने में पसीने

भारतीय रेस्टोरेंट चेन के लिए फंड जुटाना मुश्किल होता जा रहा है। निवेशक अब अंधाधुंध विस्तार के बजाय कंपनी के सस्टेनेबल प्रॉफिट (Sustainable Profit) पर ज्यादा जोर दे रहे हैं, जिससे Punjab Grill और Mad Over Donuts जैसे ब्रांड्स को नई रणनीति अपनानी पड़ रही है।

बाजार का बदलता मिजाज

भारतीय रेस्टोरेंट मार्केट में अब 'तेजी से विस्तार' की दौड़ ठंडी पड़ रही है। निवेशक अब केवल टॉप-लाइन ग्रोथ (Top-line growth) के पीछे भागने वाली कंपनियों में पैसा लगाने से कतरा रहे हैं। इसके बजाय, अब वे ऐसी कंपनियों को प्राथमिकता दे रहे हैं जो 'यूनिट इकोनॉमिक्स' (Unit economics) यानी हर स्टोर लेवल पर मजबूत और कंसिस्टेंट मुनाफा दिखा सकें।

फंड की कमी और बदलाव की कोशिश

निवेशकों की बदलती सोच ने कई मिड-साइज ऑपरेटर्स के लिए फंडिंग गैप पैदा कर दिया है। इसे देखते हुए कई बड़े नाम अब अपनी ओनरशिप और स्ट्रेटेजी में बदलाव कर रहे हैं:

  • Lite Bite Foods: पंजाब ग्रिल (Punjab Grill) और यूमी (YouMee) जैसी चेन की प्रमोटर कंपनी अपनी बहुतांश हिस्सेदारी (Majority stake) बेचने की संभावना तलाश रही है।
  • Dindigul Thalappakatti: पुराने निवेशक एग्जिट का रास्ता देख रहे हैं, जिसके लिए कंपनी नए मालिक की तलाश में है।
  • Mad Over Donuts: कंपनी पिछले 6 महीनों से अपने अगले ग्रोथ फेज के लिए फंड जुटाने की कोशिश में है।

कौन जीत रहा है निवेशकों का भरोसा?

ऐसा नहीं है कि पूरा फूड एंड बेवरेज सेक्टर फंड की कमी से जूझ रहा है। प्राइवेट इक्विटी फंड्स अभी भी एक्टिव हैं, लेकिन वे काफी चयनात्मक (Selective) हो गए हैं। जो ब्रांड्स अपनी ऑपरेशनल एफिशिएंसी साबित कर रहे हैं, उन्हें फंड मिल रहा है। उदाहरण के तौर पर, The Belgian Waffle Co को Vixar से बड़ी माइनॉरिटी इन्वेस्टमेंट मिली है, वहीं Popo Global और Trimex Foods (जो Chili's और Cinnabon चलाती है) ने भी हाल ही में अच्छी फंडिंग हासिल की है।

आगे की राह और चुनौतियां

रेस्टोरेंट ऑपरेटर्स के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपने क्षेत्रीय स्वाद को पूरे भारत में सफलतापूर्वक स्केल करना है। जो ब्रांड्स अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में अपने बिजनेस मॉडल की सफलता साबित नहीं कर पा रहे हैं, उन्हें फंड मिलना मुश्किल हो रहा है। निवेशकों की इस कड़ी सख्ती का असर यह है कि कंपनियों को अब डील्स पूरी करने में अधिक समय लग रहा है और उन्हें नए आउटलेट्स खोलने की रफ्तार धीमी करनी पड़ सकती है ताकि मौजूदा स्टोर्स के मुनाफे पर फोकस किया जा सके।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.