भारत का हॉस्पिटैलिटी सेक्टर अब महानगरों से निकलकर छोटे शहरों की ओर रुख कर रहा है। अगले पांच सालों में **1,61,074** नए ब्रैंडेड होटल रूम जोड़े जाने की योजना है, जिनमें से **80%** छोटे शहरों पर केंद्रित होंगे।
भारत का हॉस्पिटैलिटी सेक्टर अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव कर रहा है। अब फोकस दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे महानगरों से हटकर छोटे शहरों और कस्बों पर शिफ्ट हो गया है। अगले पांच साल में देशभर में 1,61,074 नए ब्रैंडेड होटल रूम जोड़ने की योजना है, जिसमें से 80% विस्तार टियर-2 और टियर-3 शहरों में होगा।
इस बदलाव की असली वजह क्या है?
यह विस्तार बेहतर सड़क कनेक्टिविटी, नए रीजनल एयरपोर्ट्स और धार्मिक पर्यटन में आई तेजी के कारण हो रहा है। तिरुपति और वाराणसी जैसे शहर इस ग्रोथ में सबसे आगे हैं, जहाँ मौजूदा क्षमता के मुकाबले होटल रूम्स की संख्या में भारी बढ़ोतरी की जा रही है। घरेलू पर्यटकों की बढ़ती संख्या को भुनाने के लिए बड़ी हॉस्पिटैलिटी कंपनियां इन इलाकों में तेजी से अपने पैर पसार रही हैं।
FY26 में कैसा रहा सेक्टर का प्रदर्शन?
ग्लोबल अनिश्चितताओं के बावजूद हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री ने FY26 में मजबूती दिखाई है। देश भर में ऑक्यूपेंसी रेट 68.1% रहा। वहीं, एवरेज डेली रेट (ADR) में 6.4% की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जो अब ₹8,962 पर पहुंच गया है। इसके अलावा, रिवेन्यू पर अवेलेबल रूम (RevPAR) में 6.2% का इजाफा हुआ और यह ₹6,099 रहा।
निवेशकों के लिए चुनौतियां
यह आक्रामक विस्तार जहां एक तरफ बड़े मौके लेकर आया है, वहीं 'ओवरसप्लाई' का खतरा भी बना हुआ है। यदि होटलों के निर्माण की रफ्तार पर्यटकों की संख्या में बढ़ोतरी से तेज रही, तो रूम रेंट और प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव आ सकता है। महानगरों के विपरीत, छोटे शहरों की निर्भरता अक्सर तीर्थयात्रियों या मौसमी पर्यटकों पर होती है।
साथ ही, इन शहरों की सफलता स्थानीय इंफ्रास्ट्रक्चर और कनेक्टिविटी पर टिकी है। दिल्ली NCR जैसे मेट्रो शहर आज भी 80% से ऊपर ऑक्यूपेंसी के साथ मजबूत बने हुए हैं, लेकिन आने वाले वर्षों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या छोटे शहरों में यह विस्तार सस्टेनेबल रेवेन्यू ग्रोथ दे पाएगा या कंपनियां अपनी क्षमता को डिमांड के हिसाब से री-एडजस्ट करेंगी।
